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बाल साहित्य की जगह

प्राथमिक और विश्वविद्यालयी उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं का बाल साहित्य, विशेषकर हिंदी बालसाहित्य किस तरह उपेक्षा का शिकार बना हुआ है, इसके अनेक उदाहरण हैं। लेकिन उनमें से दो महत्त्वपूर्ण हैं। पहला, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में वह अभी भी पाठ्य-पुस्तकों की परिधि से बाहर नहीं आ पाया है। दूसरा, […]
Author January 1, 2015 16:28 pm

प्राथमिक और विश्वविद्यालयी उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं का बाल साहित्य, विशेषकर हिंदी बालसाहित्य किस तरह उपेक्षा का शिकार बना हुआ है, इसके अनेक उदाहरण हैं। लेकिन उनमें से दो महत्त्वपूर्ण हैं। पहला, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में वह अभी भी पाठ्य-पुस्तकों की परिधि से बाहर नहीं आ पाया है। दूसरा, स्वतंत्रता के बाद हिंदी बाल साहित्य की विविध विधाओं, प्रवृत्तियों और बाल साहित्यकारों के अवदान पर भारतीय विश्वविद्यालयों से शताधिक शोध प्रबंध स्वीकृत या प्रकाशित हो चुके हैं, लेकिन बाल साहित्य को स्वतंत्र विषय के रूप में उच्चतर शिक्षा में और विशेषकर परास्नातकीय उपाधि के लिए अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। यह स्थिति शोचनीय है और इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारों को सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है।

विदेशों में अनेक विश्वविद्यालय अंगरेजी या अन्य भाषा के बाल साहित्य को स्वतंत्र विषय के रूप में परास्नातकीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत पढ़ा रहे हैं और उस पर परास्नातकीय उपाधियां भी दी जा रही हैं। कुछ विश्वविद्यालय बाल साहित्य में ‘मास्टर आॅफ आर्ट्स’ के अलावा एमएड की उपाधि और पीजी डिप्लोमा भी प्रदान कर रहे हैं। लेकिन भारत में ऐसी सुखद स्थिति नहीं है। इसका प्रमुख कारण विश्वविद्यालयों में बाल साहित्य के प्रति उपेक्षा का भाव ही है।

भूमंडलीकरण और बाजारीकरण के विश्वव्यापी विस्तार ने साहित्य को वैसे भी हाशिये पर धकेल दिया है। फिर भी उसे कम से कम उच्चतर शिक्षा में अन्य विषयों की तरह समान स्थान मिला हुआ है। पर भारतीय बाल साहित्य का तो उच्चतर शिक्षा में अभी ठीक से प्रवेश भी नहीं हुआ है। संभव है, कुछ स्वयंभू शिक्षाविदों और साहित्यकारों को यह पूरा मुद्दा हास्यास्पद लगे, क्योंकि वे तो आंखों पर पट्टी बांध कर यही घोषित करते रहते हैं कि हिंदी में बाल साहित्य है ही कहां! जबकि स्वतंत्रता के पहले से ही स्तरीय हिंदी बाल साहित्य लेखन की औपचारिक शुरुआत हो चुकी थी। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और यहां तक कि आलोचनात्मक विधा में भी हिंदी के मूर्धन्य लेखक-कवि और पत्रकारों ने सकारात्मक हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था, जिनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी, सोहनलाल द्विवेदी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, लल्ली प्रसाद पांडे, रामवृक्ष बेनीपुरी से लेकर अमृतलाल नागर, रघुवीर सहाय, आनंदप्रकाश जैन, मस्तराम कपूर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती आदि शामिल हैं।

बीते सवा सौ सालों में रचे गए हिंदी बाल साहित्य और इस दौर की हिंदी बाल-पत्रकारिता में इतना दम तो रहा ही होगा कि उसके विविध पक्षों पर विभिन्न भारतीय विश्वविद्यालयओं ने एमफिल और पीएचडी उपाधि के लिए शताधिक शोध प्रबंध स्वीकार कर उपाधियां प्रदान की हैं और इन शैक्षिक शोध प्रबंधों में अनेक प्रकाशित भी हो चुके हैं। फिर ऐसा क्या है जो हिंदी बाल साहित्य को विश्वविद्यालयी उच्चतर शिक्षा में स्वतंत्र विषय के रूप में शामिल करवाने से रोके हुए है? हो न हो, यह सरकारी तंत्र, स्वयंभू शिक्षाविदों और साहित्यकारों की इच्छाशक्ति का अभाव और बाल साहित्य के प्रति उपेक्षा भाव है।

अब जरूरत है कि सभी बाल साहित्य प्रेमी और बाल साहित्यकार हिंदी और भाषायी बाल साहित्य की स्वतंत्र सत्ता को एक होकर कर वांछित गरिमा प्रदान करें और विश्वविद्यालयों पर दबाव बनाएं कि वे अपनी स्नातकीय और परस्नातकीय उपाधियों के लिए बाल साहित्य को स्वतंत्र विषय के रूप मे स्वीकार करें, समुचित पाठ्यक्रम तैयार करें और स्नातकीय और परास्नातकीय उपाधियां प्रदान करें।

रमेश तैलंग, वैशाली, गाजियाबाद

 

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  1. M
    Manohar Lal
    Jan 9, 2015 at 7:54 am
    बाल साहित्य के मर्मज्ञ इस तरह की पहल अपने स्रोतों से हर पत्र-पत्रिकाओं में क्यों न करें?
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    Reply
    1. M
      Manohar Lal
      Jan 9, 2015 at 7:54 am
      बाल साहित्य के मर्मज्ञ इस तरह की पहल अपने स्रोतों से हर पत्र-पत्रिकाओं में क्यों न करें?
      (0)(0)
      Reply
      1. डॉ.भैरूंलाल गर्ग
        Jan 9, 2015 at 1:19 pm
        बहुत ही सार्थक मुद्दा उठाया है तैलंग जी ने ! इस विषय को गंभीरता से लिया जाना चाहिए !- डॉ.भैरूंलाल गर्ग ,संपादक'बालवाटिका' !
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        Reply
        सबरंग