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दोस्ती में दरार

जिस दिन यह तय हो गया कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा मिल कर सरकार बनाएंगी उसी दिन से लगने लगा था कि यह मिलीजुली सरकार शायद बहुत दिनों तक चल न पाए और अगर चले भी तो दोनों के बीच विचारगत टकराव अवश्य होगा। हुआ भी वही है। ताजपोशी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के […]
Author March 10, 2015 16:35 pm

जिस दिन यह तय हो गया कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा मिल कर सरकार बनाएंगी उसी दिन से लगने लगा था कि यह मिलीजुली सरकार शायद बहुत दिनों तक चल न पाए और अगर चले भी तो दोनों के बीच विचारगत टकराव अवश्य होगा। हुआ भी वही है। ताजपोशी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के नव-निर्वाचित मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जो बयान दिया, वह मीडिया में विवाद का विषय तो बना ही, लोकसभा में भी विपक्ष ने सरकार और भाजपा को जम कर निशाने पर लेते हुए इस मामले में प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण देने और निंदा प्रस्ताव पारित करने की मांग पर सदन से वॉकआउट किया।

दरअसल, शपथ-ग्रहण के बाद अपने पहले संबोधन में मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने जम्मू-कश्मीर में हाल ही में शांतिपूर्वक सम्पन्न हुए चुनावों के लिए वादी की अलगाववादी ताकतों (हुर्रियत) और खास तौर पर पाकिस्तान के सहयोगपूर्ण/ सकारात्मक रवैये की सराहना की थी। हालांकि केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री से सदन में स्पष्टीकरण देने की मांग पर गृहमंत्री ने कहा कि सरकार और उनकी पार्टी (भाजपा) सईद के बयान से अपने आप को पूरी तरह से अलग करती है। गृहमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावों की सफलता के लिए राज्य की जनता, सुरक्षा बलों और चुनाव आयोग को ही श्रेय जाता है।

असल बात तो यह है कि मुफ्ती साहब की मजबूरी है कि उन्हें सत्तासुख भी भोगना है और परंपरा से चली आ रही वादी में रह रहे कश्मीरियों के दिलों में बसी पृथकतावादी और भारत-विरोधी भावनाओं की कद्रदानी भी करनी है। प्रदेश में पिछले तीन-चार दशकों से ऐसा ही कुछ होता आया है और प्राय: हर मुख्यमंत्री ने यही किया है- पैकेज पर पैकेज केंद्र से लेते जाओ और नाइंसाफी की दुहाई भी देते रहो! चाहे खुद दो या फिर अलगाववादियों से दिलवाओ! देखना अब यह है कि क्या नई सरकार वादी के अलगाववादी संगठनों पर शिकंजा कसेगी? अगर नहीं, तो फिर पुरानी सरकारों और नई सरकार में फर्क क्या रहा?

इधर दो नई बातें और हो गई हैं। पीडीपी के कई विधायकों ने अफजल गुरु की फांसी को विवाद का मुद्दा बना लिया है और यह मुद्दा जोर पकड़ रहा है। दूसरी बात यह हो गई कि मुफ्ती सरकार ने दहशतगर्दी में संलिप्त जेलों में बंद अलगाववादियों को रिहा करना शुरू कर दिया है। इस क्रम में सबसे पहले हुर्रियत के एक धड़े के कट्टरपंथी नेता रहे मसर्रत आलम को रिहा करने के आदेश जारी किए गए। अटकलें हैं कि जमायतुल मुजाहिदीन के पूर्व कमांडर कासिम फख्तू को भी रिहा कर दिया जाएगा। कासिम कश्मीर की प्रमुख महिला अलगाववादी नेता आसिया अंद्राबी के पति हैं।

मुफ्ती सरकार के इन निर्णयों से भाजपा नाराज है। नौशहरा (जम्मू) से विधायक बने युवा मोर्चा के प्रमुख रवींद्र रैना ने स्पष्ट किया है कि ऐसे निर्णय पीडीपी और भाजपा के संबंधों में खटास पैदा कर सकते हैं। अगर इसी तरह से भाजपा और पीडीपी के बीच बदमजगी और तकरार बढ़ती गई और दोनों पार्टियों के बीच विवाद गहराता गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-भाजपा के गठबंधन में गहरी दरार पड़ जाए।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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