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चीन से चौकस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत चीनी राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोड़ कर किया तो इस पर ज्यादा गदगद होने की जरूरत नहीं है। यह गर्मजोशी इसलिए कतई नहीं थी कि चीन, भारत को अपना सबसे बड़ा सामरिक और सामाजिक साझेदार मानता है बल्कि इसलिए थी कि भारत सबसे बड़ा बाजार है जहां उसे अपना सामान बेचना […]
Author May 21, 2015 00:15 am

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत चीनी राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोड़ कर किया तो इस पर ज्यादा गदगद होने की जरूरत नहीं है। यह गर्मजोशी इसलिए कतई नहीं थी कि चीन, भारत को अपना सबसे बड़ा सामरिक और सामाजिक साझेदार मानता है बल्कि इसलिए थी कि भारत सबसे बड़ा बाजार है जहां उसे अपना सामान बेचना है। अगर ऐसा नहीं होता तो जिनपिंग की पाकिस्तान यात्रा के दौरान चीन बिना भारतीय हितों को देखे और भारत की मंशा का खयाल किए बगैर इकॉनॉमिक कॉरिडोर के मसले पर पाकिस्तान के साथ करार न करता। आज भले ही चीन इस कॉरिडोर को व्यापारिक लबादा ओढ़ा कर पेश कर रहा है लेकिन इसका दूरगामी मकसद भारत पर नकेल कसना ही है क्योंकि चीन को पता है कि ग्वादर बंदरगाह ही एक ऐसी जगह है जहां से पश्चिमी भारत को घेरा जा सकता है।

दरअसल, चीन संपूर्ण एशिया महाद्वीप में सिर्फ अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है। ऐसे में उसके सामने तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में भारत एक चुनौती है लिहाजा, एक सोची-समझी रणनीति को अपनाते हुए भारत को घेरने में लगा है। यह इसी से साबित होता है कि जिनपिंग ने पाकिस्तान को ढांचागत विकास के लिए अरबों डॉलर की मदद करके अमेरिकी मदद को भी पीछे छोड़ दिया। लेकिन विरोध इस बात पर नहीं है कि चीन ने पाकिस्तान की मदद की, बल्कि समस्या यह है कि वह पैसा उन परियोजनाओं में भी लगेगा जो पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहीं हैं जो कि मूलत: भारत का हिस्सा है। ऐसे में इससे सिर्फ यही अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन भारत को हर तरह से उलझाए रखने की कोशिश कर रहा है।

मालदीव और श्रीलंका यात्रा के दौरान शी-जिनपिंग ने कहा था कि चीन मालदीव के घरेलू मामलों में किसी भी देश की सक्रियता को अनुमति नहीं देता है। चूंकि मालदीव से भारत के संबंध काफी पुराने और मजबूत हैं इसलिए यह बयान सीधे भारत को लेकर था। इस सबके मद््देनजर चीन के मामले में हमें बहुत सजग रहने की जरूरत है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने तिब्बत के चीन का हिस्सा होने पर सहमति दी थी लेकिन इसका कोई लाभ भारत को नहीं हुआ बल्कि चीन ने कश्मीर मामले में हमेशा दबी जुबान में पाकिस्तान का ही पक्ष लिया है। लावो जनमत सर्वेक्षण में तिरासी प्रतिशत भारतीयों ने भारत को सर्वाधिक खतरा चीन से होने की बात कही थी। इसके बावजूद वर्तमान सरकार का चीन सीमा पर सैनिकों की संख्या कम करना बड़ा आश्चर्यजनक है जो कि भारतीय हितों के लिए मुनासिब नहीं है।

असल में चीन के भारत के प्रति कई चेहरे हैं। एक तरफ ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ तो दूसरी तरफ 1962 में जंग और अब रणनीति के तहत भारत को घेरना। इन स्थितियों को देखते हुए यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि हम चीन को किस चश्मे से देखें? उसकी नीति हमेशा विस्तारवादी और छद्म की रही है। ऐसे में भारत को अधिक सतर्क रह कर चीन की कुटिल चालों को समझना होगा।
धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर

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