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अपने घर के काम और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए तंग और मलिन बस्तियों में जाकर देश और समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। फिर भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जहां महिलाओं की प्रतिभा और क्षमता को उनकी उबाऊ दिनचर्या के कारण जंग लगने लगता है।
Author June 20, 2017 05:57 am
प्रतीकात्मक चित्र।

 एकता कानूनगो बक्षी 

हमारा देश अपेक्षाकृत घनी आबादी वाला भौगोलिक क्षेत्र है। अमेरिका, कनाडा और अधिकतर उन्नत देशों में आबादी का घनत्व इतना अधिक नहीं है, जितना कि हमारे कई बड़े प्रदेशों में है। यह भी एक सच्चाई है कि हमारी अधिकांश आर्थिक, सामाजिक समस्याएं भी इसी एक कारण से सामने आ खड़ी होती हैं। जितने काम लायक लोग हैं, उतना रोजगार नहीं है। यह नहीं है कि काम की कोई कमी है हमारे यहां। ‘डिप्लॉयमेंट’ और श्रम का असमान वितरण है, जिसके कारण किसी क्षेत्र में बहुत रोजगार दिखाई देता है और कहीं बेरोजगारों की विशाल फौज निरर्थक और अनुत्पादक गतिविधियों में उलझती, जूझती दिखाई देती है।

सकारात्मक नजरिए से देखें तो हमारी आबादी हमारी ताकत भी है। सही तरह से किया गया मानव संसाधन प्रबंधन हमारी प्रगति को पंख लगाने में सक्षम हो सकता है। यह बात हम सब जानते हैं और इस कथन को अनेक स्तरों पर दोहराया जाता रहा है। बेशक बेरोजगारी हमारे देश की एक जटिल समस्या है। लेकिन मैं लंबी लाइनों में लगे उन बेरोजगार युवाओं की बात नहीं कर रही। मैं यहां उन लोगों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं, जिनके पास किताबी ज्ञान के साथ-साथ अनुभव भी है। उन्होंने जीवन में बहुत कुछ हासिल किया है, वे कुछ करना चाहते हैं। वे शारीरिक रूप से सक्षम हैं, लेकिन किन्हीं कारणों से सेवा की मुख्यधारा में प्रवेश नहीं कर पाए। उनके प्रबंधन पर भी मानव संसाधन की दृष्टि से सोचा जाना चाहिए। ऐसे लोगों की बात करें, जिनसे आज बहुत कुछ की उम्मीद हो सकती है। उनमें सबसे पहले उन गृहिणियों का जिक्र हो सकता है, जिन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए अपना काम बीच में ही छोड़ना पड़ा या फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी किन्हीं कारणों से वे स्वनिर्भर नहीं हो पार्इं। नौकरी की उम्र से आगे निकल गया वह वर्ग भी है जो हमारे समाज के विकास को गति दे सकता है। दिन भर में मात्र कुछ घंटों के उनके योगदान से कितने ही उपेक्षितों तक शिक्षा और जागरूकता का संचार किया जा सकता है, जिनके पास स्कूल जाने तक का समय नहीं। हालांकि ऐसी कई नवोन्मेष कल्याणकारी योजनाएं केंद्र और प्रदेश की सरकारें समय-समय पर लाती रही हैं, लेकिन कितना काम हो पाता है, इसका ठीक-ठीक आकलन और उसके परिणाम नजर नहीं आते। लेकिन इस कदम से इस महत्त्वपूर्ण वर्ग के अंदर आत्मसम्मान और आत्मसंतुष्टि के बीज भी बोए जा सकते हैं।

ऐसे भी कई स्वैच्छिक समूह समाज में हैं, जिन्होंने इस तरह के कामों में अपना योगदान देकर मिसाल कायम की है। कई महिला कार्यकर्ता ऐसे काम में जुटी हुई हैं। अपने घर के काम और पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए तंग और मलिन बस्तियों में जाकर देश और समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। फिर भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जहां महिलाओं की प्रतिभा और क्षमता को उनकी उबाऊ दिनचर्या के कारण जंग लगने लगता है। वे ऐसी गतिविधियों से जुड़ने लग जाती हैं, जिनका उद्देश्य मात्र समय काटना भर होता है। क्या उनकी इस ऊब को उनकी रुचि में रूपांतरित करके उत्पादक गतिविधि में बदल दिए जाने की दिशा में नहीं सोचा जाना चाहिए?इनसे इतर वरिष्ठ नागरिकों का एक वर्ग है, जो अनुभव के मामले में बहुत आगे है। सेवानिवृत्ति के बाद पूरी तरह से इनके योगदान और जज्बे को अनदेखा किया जाता है। इनसे कहा जाता है कि अब आप आराम कीजिए… बहुत काम किया जीवन भर! इस तरह उनके जोश को ठंडा कर देने वाले वाक्य सुनाए जाने लगते हैं। जबकि असल में अब तक जिस पेड़ को इतने साल से उन्होंने सींचा होता है, फल अब आने शुरू हुए होते हैं। वे फल अगर समाज कल्याण के काम आएं तो फिर मिठास दोगुनी हो जाना तो तय है। हालांकि बुजुर्गों की कई ऐसी संस्थाएं हैं, जिनसे जुडेÞ लोग उम्र को धता बता कर निरंतर समाज सेवा में कार्यों में संलग्न है। ऐसे बुजुर्ग-युवाओं को क्रियाशील देख कर मन प्रेरणा से भर जाता है।

हमें सबसे ज्यादा जरूरत समाज में हर व्यक्ति के कल्याण और सफल जीवन में हमारे स्वयंसिद्ध नैतिक मूल्यों के संरक्षण की चेतना जाग्रत करने की भी है। असली पूरक शक्तियों को अक्सर हम अनदेखा कर देते हैं। नई व्यवस्था में हर शहर, गांव, बस्ती के हरेक वासी का पूरा ब्योरा दस्तावेजों में दर्ज होने की प्रक्रिया आधार आदि माध्यमों से प्रगति पर है। रोजगार के लिए आवेदक युवाओं के साथ-साथ अन्य लोगों के नियोजन पर भी उम्र, शिक्षा और अनुभव के मुताबिक उनके द्वारा समाज के विकास के लिए स्वैच्छिक काम करने की सुविधा और काम की उपलब्धता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। असल में ‘यंग इंडिया’ का सपना पूरा होना तभी संभव है, जब हर वर्ग की सोच में जोश और उमंग की तरंग पैदा हो सके। हर नागरिक समाज के अच्छे कार्यों में गतिशील और भागीदार बनाने के लिए अपने को समर्पित कर सके।

 

 

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