December 02, 2016

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अन्याय या दुर्भाग्य

विभाजन न सिर्फ इसलिए आवश्यक है कि हम कई सारी प्रक्रियाओं की, साथ ही उनके नैतिक मापदंडों की समझ बना सकें, एक नैतिक समाज की तरफ अग्रसर हो सकें।

Author नई दिल्ली | November 17, 2016 02:15 am
एटीएम के सामने खड़ी लंबी कतार। (Representative Image)

मन:स्थिति दो शब्दों के बीच फंस गई है-अन्याय या दुर्भाग्य। आम बोलचाल में जितना बोलबाला इन दो शब्दों का है, समाज विज्ञान और शोध की दुनिया में न्याय शब्द का ज्यादा बोलबाला है। इसके बावजूद अन्याय शब्द आम जन के व्यवहार और अपने भाव व्यक्त करने में ज्यादा इस्तेमाल होता है। मन:स्थिति और चिंतन कभी भी खयालों तक सीमित नहीं होते, उनका व्यक्ति विशेष के इर्द-गिर्द चल रहे सिलसिलों, हालात से खास नाता होता है। दरअसल, ये दो शब्द आजकल के नीति के संदर्भ में ऊर्जावान हुए हैं। अब तक विमुद्रीकरण (डीमोनेटाइजेशन) की वजह से बीस से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। एक महिला ने तो दो दिन परेशान होकर रात को अपने घर में फांसी लगा ली। इन बीस से ज्यादा मौतों, या इस जज्बे से भरी क्रिया (फांसी) को हम क्या नाम दें? दुर्भाग्य इसके लिए एक हद तक सही शब्द लगता है। अब एक नवजात का पैसे की कमी से इलाज न हो पाना, या किसी को लंबी कतार में खड़े रहने में हार्टअटैक आना, या किसी का फांसी लगाना किसी दुर्भाग्य से कम नजर नहीं आता। पर क्या यह सचमुच दुर्भाग्य है? दरअसल, दुर्भाग्य और अन्याय में अंतर करना बेहद जरूरी है।

यह विभाजन न सिर्फ इसलिए आवश्यक है कि हम कई सारी प्रक्रियाओं की, साथ ही उनके नैतिक मापदंडों की समझ बना सकें, एक नैतिक समाज की तरफ अग्रसर हो सकें। जहां दुर्भाग्य एक अनहोनी, आकस्मिक घटना, भूचाल, मृत्यु भिन्न कारणों से, आदि-इत्यादि को दर्शाता है, अन्याय भी इन्हीं पर ध्यान केंद्रित करता है। पर ये पहलू तब दुर्भाग्य से उठ कर अन्याय बन जाते हैं जब इनमें मनुष्य, किसी राजनीतिक संस्था या विशेष राजनीतिक स्थान की अहम भूमिका रहती है। अन्याय वहां होता है जहां प्रकृति या ईश्वर मनुष्य, जानवर, पेड़ पौधों पर अपना क्रोध या ताप नहीं डालते। बल्कि जहां हमारा हाथ ज्यादा होता है इन प्राकृतिक घटनाओं को आपदा, आकस्मिक मृत्यु का रूप देने में। जहां भी हमें यह मनुष्य का हाथ नजर आए, वहां हम दुर्भाग्य शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

अगर इस तर्क को विचार-विमर्श का हिस्सा बनाया जाए तो देश हित के ध्वज तले हम सब लोग एक अन्याय का इतिहास फिर लिख रहे हैं। इस अन्याय के इतिहास को दुर्भाग्य के शीर्षक तले छुपाने का प्रयास कर रहे हैं। नवजात से लेकर वृद्ध की मृत्यु कोई दुर्भाग्य नहीं बल्कि हमारे नीति स्वामियों के कदम का नतीजा है। यदि आप अब भी इसे दुर्भाग्य कहें तो कहना वाजिब होगा- यही सौभाग्य है दुर्भाग्य का, कि कभी अन्याय बन गले के नीचे नहीं उतरता।
’आदित्य, दिल्ली

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First Published on November 17, 2016 2:10 am

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