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जनसत्ता चौपाल : खिलाड़ी के नाम

हे शूरवीर ओलंपिक प्रतिभागी! हे खेल श्रेष्ठ! यह जानकर बहुत प्रसन्नता है कि तुम अपने साथियों सहित खेल महाकुंभ में पहुंचाए गए हो! तुम पूछ सकते हो मैंने परंपरागत रूप से ‘पहुंचने’ की बजाय ‘पहुंचा दिए गए’ क्यों कहा?
Author नई दिल्ली | August 20, 2016 06:25 am
रियो में भारतीय दल के लगातार निराशाजनक प्रदर्शन के बीच कुश्ती और बैडमिंटन ने पदक की उम्मीद बरकरार रखी है।

हे शूरवीर ओलंपिक प्रतिभागी! हे खेल श्रेष्ठ! यह जानकर बहुत प्रसन्नता है कि तुम अपने साथियों सहित खेल महाकुंभ में पहुंचाए गए हो! तुम पूछ सकते हो मैंने परंपरागत रूप से ‘पहुंचने’ की बजाय ‘पहुंचा दिए गए’ क्यों कहा? तो बंधु, भारतीय खिलाड़ी सिर्फ खेलता है। उसका प्रतियोगिता में हिस्सा लेना उसके बस में कभी नहीं होता। मूल प्रतियोगिता में उतरने के पहले उसे कई छद््म प्रतियोगिताओं में संघर्ष करना पड़ता है। यहां भी उसकी जीत या हार कोई खास मायने नहीं रखती। तुम भाग्यशाली रहे कि आखिर तुम्हारे कदम भी किसी न किसी तरह इस महाकुंभ की धरती पर पड़े। वरना आज भी तुम्हारे जैसे कई शूरवीर खिलाड़ी आशा का दीप जलाए चंदन चाचा के बाड़े में मल्लयुद्ध का अभ्यास करते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा में बैठे रह गए हैं।

हालांकि तुम्हारे साथ और भी कई खिलाड़ी वहां गए हैं जिनकी ओर भारत आशाभरी नजरों से देख रहा है। मगर तुम जानते ही हो, जब हमारे खिलाड़ी खेलने जाते हैं तो सवा सौ करोड़ का एक हिंदुस्तान वहां किसी एक खिलाड़ी में केंद्रित हो जाता है। कभी मिल्खासिंह भारत बन जाते हैं या कभी पप्पू यादव और कभी वह किसी एक विराट, विश्वनाथन आनंद, पीटी उषा, लिंबाराम या साक्षी मलिक में सिमट जाता है।

तो प्रिय खेल श्रेष्ठ! तुम वहां एक भारत हो और समूचा आर्यावर्त तुम्हारे स्वर्ण पदक (या जो भी मिल जाए) को अपने भाल पर स्पर्श करना चाहता है। महाबली भीम रूपी विशाल भारतीय खेल जगत तुम्हारे किसी चमत्कारी दांव की प्रतीक्षा में विजयमंत्रों की ध्वनि तरंगें और यज्ञ आहुतियों के धूम्र को रियो रणक्षेत्र की दिशा में प्रवाहित करने में तल्लीनता से संलग्न हो गया है।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि जब तुम अपना खास दांव लगा रहे हों तब यहां भारत में हो रही सामान्य घटनाएं तुम्हारा ध्यान भंग न कर सकें। संसद के हंगामे तुम्हारी स्मृति से विलुप्त हो चुके हों। छद्म गोरक्षकों का आतंक और दलितों के आंदोलन, नेताओं के विवेकहीन ओछे बयान और बड़ी संख्या में सामूहिक बलात्कार, हमारी भूलों के कारण आई विकराल प्राकृतिक आपदाएं आदि की घटनाएं तुम्हारे मन-मस्तिष्क को प्रभावित न कर सकें।

श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए शरीर के साथ-साथ मन मस्तिष्क का स्वस्थ होना बहुत जरूरी होता है। तुम्हारा देश भले ही कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा है, लेकिन परिस्थितियां इतनी भी विकट और विषम नहीं हैं कि उनकी चिंता में तुम अपना पदक गवां बैठो। तुम रियो से पदक जीत कर अवश्य लाना। हम आस लगाए बैठे हैं, निराश मत करना।
ब्रजेश कानूनगो, गोयल रिजेंसी, इंदौर


रियो की सीख
रियो ओलंपिक में जिस जज्बे के साथ दीपा कर्मकार ने अपने खेल का जबर्दस्त प्रदर्शन किया वह साबित करता है कि अगर हम अपने खिलाड़ियों पर ध्यान दें तो कोई ताकत हमें स्वर्ण पदक लाने से नहीं रोक सकती। अगर हमारे खिलाड़ी अभाव में भी अपने लिए संभावना तलाश कर सकते हैं तो हम उनकी इस संभावना को साकार करने के लिए एक छोटी-सी पहल तो कर ही सकते हैं।

रियो ओलंपिक में बेशक हमें कुछ न मिले लेकिन जो सीख इससे मिली है, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हमारी पिछली सरकारों ने क्या किया उस पर ध्यान देने से कुछ हासिल नहीं होगा। आगे क्या करना है कि खिलाड़ियों की राह में कोई रुकावट न आए, इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

रोहित कुमार पाठक, बलजीत नगर, दिल्ली


दलित चेतना
गुजरात बड़े आंदोलनों का गवाह रहा है। आजादी के पहले और बाद में वहां से कई आंदोलन शुरू हुए हैं। 1974-75 के जेपी आंदोलन की शुरुआत भी गुजरात से ही हुई थी। राज्य में तब छात्रावासों का मेस बिल बढ़ाने के विरोध में छात्रों ने आंदोलन किया था और तत्कालीन कांग्रेस सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। इसी से प्रेरित होकर बिहार से जेपी ने बिहार लोक संघर्ष समिति के बैनर तले तत्कालीन इंदिरा सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था। अब गुजरात में उना की घटना के बाद दलित आंदोलन शुरू हुआ है। वहां इसके तहत दलित अस्मिता यात्रा निकाली गई है। इसमें जिस तरह से लोगों ने भाग लिया, उससे उम्मीद है कि यह चेतना देश भर में फैलेगी। यदि यह आंदोलन दलितों को अपने हक के लिए लड़ने की प्रेरणा दे पाया तो आजाद भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। इस तरह गुजरात में एक नई आजादी की पटकथा तैयार हो रही है। आशा है कि मनुवादी ताकतें परास्त होंगी और समानता और बंधुत्व की एक नई इबारत लिखी जाएगी।

शशांक मणि चतुर्वेदी, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश


पाक को जवाब
सालों से बार-बार कहा जाता रहा है कि पाकिस्तान जब भी कोई बात करता है तो कश्मीर मुद्दे को सामने रख देता है। आखिर इस सबका औचित्य क्या है? जब कश्मीर भारत का ही अभिन्न अंग है तो उस पर पाकिस्तान हो या कोई अन्य देश, उससे बात करने का प्रश्न ही नहीं। यह हमारी और कश्मीर वासियों की आंतरिक समस्या है जिसका समाधान कश्मीरवासी और देश की सरकार निकाल ही लेगी। प्रधानमंत्री ने सही कहा कि बात करो कश्मीर के उस भाग पर जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है और पाकिस्तान उस क्षेत्र के लोगों पर अत्याचार कर रहा है, जिसका वहां विरोध भी हो रहा है। इन्होंने स्पष्ट कहा कि कश्मीर के मुट्ठीभर अलगाववादी वहां हो रहे अत्याचार से सबक लें और अपनी शक्ति कश्मीर के विकास में लगाएं; मुंह ढंक कर दूसरे देश का झंडा फहराने से कुछ नहीं होना है सिवाय अपने नुकसान के; झंडे तो दिल्ली में भी सभी राष्ट्रों के दूतावासों में फहराते ही रहते हैं। गृहमंत्री के रवैये के बाद प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रति जो रुख अपनाया उससे पूरी संसद एक हुई। इसी रुख को जारी रखते हुए वित्तमंत्री को भी पाकिस्तान का दौरा न करके देश का विरोध प्रकट करना होगा और यह प्रक्रिया लंबे समय तक जारी रख कर पाकिस्तान को सुधारने का प्रयास किया जा सकता है।
यश वीर आर्य, देहरादून

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