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बदला या बदलाव, ध्यान दें किसान

एक तरफ आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा की राजनीति और दूसरी तरफ आंबेडकर के प्रति लगाव, यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि भाजपा अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है।
Author April 18, 2017 01:22 am
बसपा सुप्रीमो मायावती। (फाइल फोटो)

बदला या बदलाव
पिछले दो दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती आंबेडकर के दलित जीवन का भरपूर लाभ लेती रहीं, लेकिन लगभग पंद्रह दिन पहले औपचारिक बैठक के बाद आंबेडकर के प्रति उमड़ी भाजपा की श्रद्धा शायद उसी की फोटोकॉपी है। सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ सत्ता में आने वाली भाजपा भी अगर जाति-वर्ग की राजनीति करती है तो यह बदला होगा या बदलाव, समझना बिल्कुल आसान है। एक तरफ आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा की राजनीति और दूसरी तरफ आंबेडकर के प्रति लगाव, यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है कि भाजपा अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। वह खुद नहीं समझ पा रही है कि तवज्जो किसको दे? जातिवाद को या विकासवाद को?  आज मोदी सरकार को जनता की सोच को पहचानना होगा। उन्हें 2019 की सत्ता का लोभ त्यागते हुए जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही दलित वर्ग को भी अपने वास्तविक हितैषी को पहचानना चाहिए और समर्थन उसी का करना चाहिए जो उसके विकास के प्रति समर्पित हो।
’अनुराग जायसवाल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
ध्यान दें किसान
गेंहू की कटाई के बाद बचा भूसा या कचरा जलाने से खेतों की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। नजीजतन, किसान अधिक मात्रा में रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं। इस खाद की ऊंची कीमतों का अतिरिक्त बोझ उठाने से उनकी आर्थिक हालत बद से बदतर होती जाती है। गेंहू के भूसे या अन्य फसलों के अवशेष जलाने से पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ता है, तापमान में वृद्धि होती है। तापमान में वृद्धि भूसा जलाने से निकलने वाली कार्बन डाईआक्साइड आदि गैसों से भी होती है जिसका सीधा असर ग्लोबल वार्मिंग के रूप में देखा जा रहा है। इस धुएं से लोगों को दमा, आंखों में जलन, खांसी और अन्य खतरनाक बीमारियां होने लगी हैं। लिहाजा, किसानों को चाहिए कि भूसा जलाने की बजाय उसे जमीन में दबा दें या पशुओं को खिलाएं। इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ेगी और पशुओं के गोबर की खाद मिल जाने से रासायनिक खाद का प्रयोग कम करना पड़ेगा। किसानों को चाहिए कि आगामी बाईस अप्रैल को पृथ्वी दिवस पर अपनी धरती को प्रदूषण मुक्त करने का प्रण लें।
’राकेश ढुंढाड़ा, बाबा फरीद कॉलेज, बठिंडा

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