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चौपाल : सुधार की उम्मीद

आखिर वही हुआ जिसका अनुमान कई राजनीतिक पंडितों ने लगाया था। मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में कई वरिष्ठ मंत्रियों के पर कतरे गए। इनमें सबसे बड़ी पदावनति अगर किसी की हुई तो वे हैं स्मृति ईरानी।
Author नई दिल्ली | July 7, 2016 00:47 am
स्मृति ईरानी के साथ प्रकाश जावेड़कर। (File Photo0

आखिर वही हुआ जिसका अनुमान कई राजनीतिक पंडितों ने लगाया था। मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में कई वरिष्ठ मंत्रियों के पर कतरे गए। इनमें सबसे बड़ी पदावनति अगर किसी की हुई तो वे हैं स्मृति ईरानी। ये वही मंत्री हैं जो किसी भी विरोधी की जरा-सी टिप्पणी से खिन्न होकर उसे जवाब दे देती थीं। चाहे ‘ट्वीट’ के जरिए बिहार के शिक्षा मंत्री से ‘डियर’ पर हुआ विवाद हो या संसद में मायावती से गर्मागर्म बहस, स्मृति अक्सर विवाद में रही हैं। हैदराबाद का रोहित वेमुला हो या जेएनयू का कन्हैया, दोनों ही मामले जीवन भर ईरानी की ‘स्मृति’ में रहेंगे। आइआइटी में संस्कृत पढ़ाने का तर्क हो या देश की शिक्षा नीति का भगवाकरण करने के आरोप, मोदी सरकार के दो साल में स्मृति का नाम हर बार विवाद में आता ही रहा। उनसे जुड़ा डिग्री विवाद तो लंबे समय तक मीडिया की सुर्खियां बटोरता रहा।

मोदी ने एक चुनावी सभा में स्मृति को अपनी बहन बताया था। आज अपनी उसी बहन की पदावनति कर उन्होंने साफ कर दिया कि आपका कामकाज मायने रखता है, करीबी होने से काम नहीं चलेगा। ऐसा ही मामला जेटली का भी है। जेटली से सूचना प्रसारण मंत्रालय छिन लिया गया। हालांकि इन सबके बीच मध्यप्रदेश के लिए बड़ी सुकूनभरी खबर यह आई कि केंद्रीय स्तर पर प्रदेश का नेतृत्व वजनदार हुआ है। लोकसभा अध्यक्ष से लेकर कई बड़े मंत्रालय इस राज्य से चुने गए जनप्रतिनिधियों को मिले हैं। एमजे अकबर, अनिल माधव दवे, थावरचंद गहलोत, नरेंद्र सिंह तोमर, सुषमा स्वराज, नजमा हेपतुल्ला, फग्गन सिंह कुलस्ते, ये सभी वे नाम हैं जो सरकार में महत्त्वपूर्ण किरदार में तो हैं ही, प्रदेश के विकास में भी अहम भूमिका निभाएंगे। मध्यप्रदेश के लोगों को इनसे काफी उम्मीदें होंगी।

आने वाले तीन साल मोदी सरकार के लिए किसी आग के दरिया से कम नहीं हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में आम लोगों से किए गए वादों और जमीनी स्तर पर हुए काम के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। महंगाई मिटाने और अच्छे दिन आने के वायदे को लेकर लगातार सरकार की किरकिरी होती आई है। सोशल मीडिया पर लोगों की विरोध से भरी तीखी प्रतिक्रियाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। मोदीजी के विदेश दौरों को लेकर विपक्ष लगातार हमला करता रहा है। इसके साथ ही परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता के मामले में हाथ लगी विफलता ने भी उनकी छवि को थोड़ा-बहुत नुकसान तो पहुंचाया ही है। लगातार पार्टी सांसदों और विधायकों की बदजुबानी भी आए दिन सरकार की किरकिरी कराती रही है। देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में पिछली भूलों से सबक लेकर सरकार के प्रदर्शन और पार्टीजनों के आचरण में कितना सुधार हो पाता है।

हितेश एन शर्मा, इंदौर

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