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चौपाल : समान कानून

समान नागरिक कानून पर जहां ईसाइयों और मुस्लिम महिलाओं का नजरिया समर्थन का दीख रहा है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ रूढ़िवादी तत्त्व पूरी तरह अड़ंगेबाजी के मूड में हैं।
Author नई दिल्ली | July 5, 2016 01:22 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

समान नागरिक कानून पर जहां ईसाइयों और मुस्लिम महिलाओं का नजरिया समर्थन का दीख रहा है, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ रूढ़िवादी तत्त्व पूरी तरह अड़ंगेबाजी के मूड में हैं। खुद संविधान-निर्माता बाबासाहब आंबेडकर ने 1949 में ऐसे लोगों को समझाने की कोशिश की थी। उनके द्वारा दिए गए तर्क बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। बाबासाहब ने कहा था कि भारत में शरीयत (मुस्लिम कानून) में अस्सी फीसद बदलाव हो चुका और उससे इस्लाम पर कोई खतरा नहीं आया, आगे और समयानुकूल परिवर्तन करने से भी कोई संकट नहीं आएगा। उन्होंने इस्लामी विधि में हो चुके बदलाव की सूची भी जारी की थी। कानून बना कर 1772 में काजी के स्थान पर अंग्रेज जजों का फैसला हुआ। इस्लाम में स्वीकार्य गुलामों की प्रथा 1843 में समाप्त की गई। सन 1860 में पूरा इस्लामी अपराध कानून खत्म कर सबके लिए भारतीय दंड संहिता लागू की गई। 1861 में जाब्ता फौजदारी (सीआरपीसी) और 1872 में साक्ष्य अधिनियम (एविडेंस एक्ट) लागू हुआ। 1882 में जाब्ता दीवानी (सिविल प्रोसीजर कोड) और संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम (ट्रांसफर आॅफ प्रॉपर्टी एक्ट) सभी के लिए एक बना। इस सबके द्वारा कुरान-हदीसों आदि में प्रतिपादित शरीयत की अपराध, साक्ष्य, विक्रय एवं दायित्व संबंधी पूरी विधि-व्यवस्था खत्म हो गई। यदि निजी कानून भी बदल गए, जैसा अनेक मुस्लिम देश कर भी चुके हैं, तो इस्लाम खतरा-ग्रस्त नहीं होगा। कोई बुद्धिमान बाबासाहब के तर्कों से असहमत नहीं हो सकेगा।

अजय मित्तल, खंदक, मेरठ

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