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बदहाल संथाल

झारखंड का एक अत्यंत पिछड़ा क्षेत्र है संथाल परगना, जहां के आदिवासी आज भी बहुत मुफलिसी में जी रहे हैं।
Author September 14, 2017 01:43 am
प्रतीकात्मक चित्र।

बदहाल संथाल
झारखंड का एक अत्यंत पिछड़ा क्षेत्र है संथाल परगना, जहां के आदिवासी आज भी बहुत मुफलिसी में जी रहे हैं। इनके लिए सरकार की कई योजनाएं हैं पर उनका असर इस क्षेत्र में कहीं देखने को नहीं मिलता। इन्हें पीने के लिए साफ पानी तक मयस्सर नहीं है। न अस्पताल हैं न स्कूल। खेती करने के लिए थोड़ी-बहुत जमीन भी नहीं है इनके पास। जहां अस्पताल या स्कूल हैं भी वहां शिक्षक और डॉक्टर नदारद रहते हैं।

कई पीढ़ियों से ये बीड़ी पत्ता और महुआ बेच कर गुजर-बसर करते आ रहे हैं लेकिन उस पर भी अब वन विभाग पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। नतीजतन, इनके लिए एक वक्त के भोजन के भी लाले पड़ गए हैं। यहां के सुंदरपहाड़ी इलाके में औसतन महीने में भूख से एक मौत हो जाती है। इस क्षेत्र के लगभग सत्तर फीसद आदिवासी कुपोषित हैं, जिसे लेकर न तो स्वास्थ्य विभाग चिंतित है, न स्थानीय प्रशासन और सरकार। कई झोपड़े आपको ऐसे मिलेंगे जिनमें सूअर और पूरा परिवार एक साथ रहते हैं। थोड़े-बहुत राशन के लिए कभी-कभी दुकानदार के पास इन्हें अपने पुराने बर्तन तक गिरवी रखने पड़ते हैं। यदि सरकार और स्थानीय प्रशासन अब भी नहीं जागे तो समझिए मानवता यहां दम तोड़ देगी।
’वैभव विवेक झा, गोड्डा, झारखंड
दहेज का दानव

प्रयाग शुक्ल के ‘दुनिया मेरे आगे’ (दहेज की देह-यातना, 7 सितंबर) में सीमित चित्रण देखने को मिला। भारतीय समाज में दहेज प्रथा का सही पोषक उच्च वर्ग है लेकिन आम पाठक मध्य वर्ग को ही इसका जिम्मेदार मानता आया है क्योंकि ऐसा ही बताया जाता रहा है। मध्य वर्ग की ये आकांक्षाएं उच्च वर्ग के संपर्क में आने पर बढ़ी हैं। अमीरों की शादियों में जाकर उनके जैसी ही शादी करने की होड़ से मध्यवर्ग ग्रस्त हो गया है। अनेक कहानियों और उपन्यासों में आपको इसके उद्धरण मिल जाएंगे। इससे इतर बजट की संकल्पना कोरी ब्राह्मणवादी है क्योंकि बिचौलिए का कमीशन उसी से तय होता है और फिर बिचौलिए लग जाते हैं जुगाड़ बिठाने में। ऐसे में दहेज ही शादी के लिए चरम प्रेरणा का काम करता है और उसके बाद भी भूख न मिटे तो और मांगिये, मांगने पर न मिले तो नोचिये; उससे भी हवस न मिटे तो हत्या, दहन, बलात्कार न जाने क्या-क्या!

दहेज की देह यातना का ऊपरी पक्ष ही अभी भारत ने देखा है। करोड़ों मामलों में से हजारों की ही प्राथमिकी दर्ज हो पाती है और उनमें से भी सैकड़ों वापस ले लिए जाते हैं। कारण, हम सब जानते है क्यों। दहेज का राक्षस किसी एक के प्रयास से नहीं मरेगा, इसके लिए पूरे समाज को एकजुट होना होगा।
’अजय कुमार अजेय, करावल नगर, दिल्ली

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