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चौपाल : दावे और हकीकत

वे जम्मू और अन्य जगहों पर लू में तपते शरणार्थी शिविरों में अमानवीय परिस्थितियों में रह रहे कश्मीरी पंडितों के दुख-दर्द और उनकी त्रासद स्थितियों को देखने नहीं गर्इं बल्कि खुशनुमा मौसम में कश्मीर जाकर वहां के बहुसंख्यकों का आतिथ्य स्वीकार कर उनकी बातों को सामने लाना ज्यादा मुनासिब समझा।
Author नई दिल्ली | July 5, 2016 01:14 am
कश्मीरी पंडितों से मिलतीं जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती। (पीटीआई फोटो)

विस्थापित कश्मीरी पंडितों को घाटी में वापस बसाने की एक नई तजवीज सामने आई है। इस बार यह तजवीज किसी राजनीतिक दल के नेता या फिर सरकार ने पेश नहीं की है, बल्कि यह ‘प्रस्ताव’ एक टीवी चैनल की प्रतिष्ठित पत्रकार की तरफ से आया है। प्रस्ताव इस बात पर आधारित है कि यदि विस्थापित पंडित वादी में अपने मुस्लिम भाइयों/ परिवारों के साथ रहने लग जाएं तो वादी में अमन-चैन और सौहार्द की फिजा कायम होगी और कमोबेश कश्मीर-समस्या का भी निपटारा अपने आप हो जाएगा। एक मुसलिम परिवार के घर में ‘सौहार्द-बैठक’ आयोजित की गई जिसमें चुने हुए सहभागियों से भाईचारे, सुख-शांति और सौहार्द की बातें कहलवाई गर्इं। ‘कश्मीर डायरी’ नाम के इस कार्यक्रम को देख कर लगा कि यह प्रायोजित था। वास्तविकता से एकदम कोसों दूर! सीधी-सी बात है कि पंडितों को अगर वादी में भाईचारे और शांति-सद्भाव का माहौल दिखता तो वे 1990 में अपना घरबार छोड़ कर भागते ही क्यों? उन्हें जिहादी चुन-चुन कर मारते ही क्यों?

गौर करने वाली बात यह है कि जिस वादी में आए दिन ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’, ‘हमें क्या चाहिए? आजादी’ आदि नारे लगते हों, जिस श्रीनगर शहर में हर शुक्रवार को पाकिस्तानी झंडे फहराए जाते हों, जहां के अलगाववादी नेता कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग मानने को तैयार न हों, जहां हर दूसरे-तीसरे दिन जिहादियों और सुरक्षाकर्मियों के बीच मुठभेड़ होती रहती हो, जहां के कट्टरपंथी नेता कश्मीरी पंडितों को अलग से बसाने और सैनिक कॉलोनियों का निर्माण करने के विरोध में धरने-प्रदर्शन करते हों, वहां पर पत्रकार महोदया पंडितों को यह पाठ पढ़ाएं कि वे वादी में आकर बहुसंख्यकों यानी मुसलिम भाइयों के साथ गले में बांहें डाल कर रहने का मन बनाएं, एक बचकानी और तर्कहीन अवधारणा ही समझी जाएगी।
वादी में 1990 में पंडित-समुदाय के लोगों की संख्या साढ़े तीन लाख थी जो अब सिमट कर महज दस हजार के करीब रह गई है। बाकी के तीन लाख चालीस हजार कहां गए, क्योंकर गए, इससे पत्रकार का कोई लेना-देना नहीं।

वे जम्मू और अन्य जगहों पर लू में तपते शरणार्थी शिविरों में अमानवीय परिस्थितियों में रह रहे कश्मीरी पंडितों के दुख-दर्द और उनकी त्रासद स्थितियों को देखने नहीं गर्इं बल्कि खुशनुमा मौसम में कश्मीर जाकर वहां के बहुसंख्यकों का आतिथ्य स्वीकार कर उनकी बातों को सामने लाना ज्यादा मुनासिब समझा। कौन नहीं जानता कि जिन महानुभावों ने विभोर होकर भाईचारे के विचार उक्त कार्यक्रम में रखे उन्हें घाटी में पूरी-पूरी सुरक्षा मिली हुई है। कश्मीर में रहने के उनके अपने-अपने हित हैं और पत्रकार ने अपने कार्यक्रम के पक्ष में इन बातों को बखूबी भुनाया।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

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