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केवल राजनीति

केवल दो अपवादों को छोड़ दें जब 2001 में विद्यार्थी परिषद के संदीप महापात्र मामूली अंतर से अध्यक्ष पद पर जीत गए और चौदह साल बाद 2015 में इसी पार्टी के सौरभ शर्मा जीत कर सेंट्रल पैनल में पहुंचे, तो आधी सदी बीत जाने के बाद भी इसका सियासी स्वाद नहीं बदला है।
Author September 12, 2017 05:16 am
JNU Election Result: जेएनयू छात्रसंघ चुनाव 2017 में जीत हासिल करने वाले उम्‍मीदवार। (Photo: Twitter)

स्कूल में हत्या
गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के मासूम छात्र की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। आखिर उस अबोध बच्चे प्रद्युम्न ने किसी का क्या बिगाड़ा था जिसने अभी जिंदगी के साथ कदमताल मिलाना शुरू ही किया था! यह भयावह घटना स्कूल-प्रशासन की सुरक्षा मामलों को लेकर गंभीर लापरवाही को भी दर्शाती है। आखिर बच्चों के साथ स्कूल समय में स्कूल परिसर के भीतर या बाहर छेड़छाड़ और यौन-शोषण सरीखे हादसे दिनोंदिन क्यों बढ़ते जा रहे हैं? ऐसी दिल दहला देने वाली ज्यादातर घटनाओं में नामी स्कूलों का नाम ही सुर्खियों में रहता है।

अभिभावकों से भारी-भरकम फीस लेने के बावजूद नौनिहालों की सुरक्षा को नजरअंदाज करना विद्यालय प्रबंधन की संवेदनहीनता, असामाजिकता व काहिली को भी उजागर करता है। भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति न हो; इसके लिए शासन-प्रशासन को तमाम शिक्षण-संस्थानों खासकर निजी विद्यालयों में नियमन की व्यवस्था दुरुस्त करनी चाहिए। साथ ही विकृत मानसिकता वाले बेलगाम तत्त्वों पर कस कर लगाम लगानी होगी।
’नीरज मानिकटाहला, यमुनानगर, हरियाणा

केवल राजनीति
जेएनयू छात्र संघ चुनाव के परिणाम आ गए। राजधानी दिल्ली के भीतर इस परिसर का स्वभाव शेष भारत से काफी अलग रहा है। केवल दो अपवादों को छोड़ दें जब 2001 में विद्यार्थी परिषद के संदीप महापात्र मामूली अंतर से अध्यक्ष पद पर जीत गए और चौदह साल बाद 2015 में इसी पार्टी के सौरभ शर्मा जीत कर सेंट्रल पैनल में पहुंचे, तो आधी सदी बीत जाने के बाद भी इसका सियासी स्वाद नहीं बदला है। 2017 में फिर वामपंथ की जीत हुई है और दक्षिणपंथ की हार। कट्टर बहुजनवाद के नाम पर बना बापसा नाम का एक तीसरा संगठन भी है जिसका यह तीसरा चुनाव था। चुनावी पराजय के बावजूद उसने बेहद मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। जिस सियासी दल ने इस संस्थान की परिकल्पना की और उसे साकार भी किया उसके छात्र संगठन एनएसयूआई को नोटा से करीब आधे से भी कम वोट मिले।

इस चुनाव में एक बार फिर से चाहे ऊपरी तौर पर कुछ बदलाव नहीं लगा हो मगर इसके भीतर-भीतर बहुत कुछ बदल गया है। जैसे डिबेट में वामपंथी उम्मीदवारों द्वारा वर्ग के बजाय देश की आम राजनीति की तरह बार-बार अपनी जाति बताना और छात्र हित से जुड़े ‘सीट कट’ के मुद्दे पर विद्यार्थी परिषद को घेरने की बजाय गोमाता और भारत माता के मुद्दों पर बहस छेड़ना। चौबीसों घंटे सातों दिन चलने वाले ढाबे का अब रात 11 बजे बंद हो जाना, विश्वविद्यालय के रेलवे काउंटर पर बाहर टिकट काटने का समय कम करना और बाहरी लोगों के लिए इसे बंद करने जैसे अनेक छोटे-छोटे बदलाव हैं जो इस परिसर में 9 फरवरी 2016 के बाद आए हैं। ये सभी बातें एजेंडे से गायब रहीं। एजेंडे में रहीं तो भारत माता, गोमाता, दलित उत्पीड़न और कुछ सीरिया-फिलस्तीन के मुद्दे जिन पर नया जनादेश चाह कर भी कोई बदलाव नहीं कर सकेगा। इस जनादेश ने बताया है कि छात्र राजनीति से छात्र गायब है और केवल राजनीति रह गई है।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली

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