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चौपाल: धीरे रे मना

समाज और देश को बेहतर बनाने का संकल्प बहुत पवित्र होता है, बशर्ते कि इसके पीछे एक दंभ से भरी महत्त्वाकांक्षा न छिपी हो।
Author September 7, 2016 05:43 am
प्रतिकात्मक चित्र।

अपने समाज के साथ चलते हुए, कहीं थोड़ा रुकते-ठहरते, कुछ सोच कर फिर आगे चलते, कहीं साम्य बिठाते तो कभी थोड़ी मनमानी करते हुए आदमी प्रगति की अपनी कठिन यात्रा तय करता है। प्रगति की यह यात्रा व्यक्तिगत हो या सामूहिक, आसान नहीं हुआ करती। श्रमसाध्य होने के साथ-साथ यह अनेक चुनौतियों भरी भी होती है। समाज और देश को बेहतर बनाने का संकल्प बहुत पवित्र होता है, बशर्ते कि इसके पीछे एक दंभ से भरी महत्त्वाकांक्षा न छिपी हो। मुझे यह विचार कायाकल्प वाली बात पढ़ कर आया जिसका उल्लेख प्रधानमंत्रीजी ने नीति आयोग के आयोजन में ‘भारत परिवर्तन’ विषय पर दिए अपने व्याख्यान में किया था। वैसे तो सरकार की दो वर्ष की उपलब्धियों वाले जश्न में भी कायाकल्प की बात छाई रही थी लेकिन अभी प्रधानमंत्रीजी ने फरमाया कि देश का कायाकल्प रत्ती-रत्ती प्रगति से नहीं होगा। यानी देश का कायाकल्प करना है और वह भी तेजी के साथ, चुस्ती-फुर्ती के साथ। काश, दलितों पर होने वाले अत्याचार रोकने और कश्मीर को संभालने में भी ऐसी चुस्ती-फुर्ती दिखाई गई होती!

देखिए, ऐसी टिप्पणियां या तो जज्बाती किस्म के लोगों के गले उतर सकती हैं जो बिना आगा-पीछा, बायां-दायां, नीचे-ऊपर देखे, बिना रुके-सोचे केवल भागते चले जाने में दिलचस्पी रखते हैं और या जोश से भरे कुछ युवाओं के, जिन्हें पुराने के नाम से ही चिढ़ होती है और जिन्हें जोश के साथ होश की शिक्षा देकर समझदार और परिपक्व बनाना हमारा कर्तव्य है।
यहां सवाल यह भी है कि आप कैसा कायाकल्प चाहते हैं? यदि विगत में किए-धरे को धराशायी करके सब कुछ नया गढ़ना ही कायाकल्प है, तो यह खेल सचमुच खतरनाक है क्योंकि पुराने की बुनियाद बहुत गहरी होती है। और यह बुलेट ट्रेनों वाली तेजी भी आखिर किसलिए? जिंदगी की रफ्तार तो पहले ही हदें लांघ चुकी है। अब तो शिव की तरह भागीरथी को नियंत्रित करने की जरूरत है।

मैंने सरकारी परिसरों के हरे-भरे स्वस्थ विशाल वृक्षों को समूल उखाड़े जाते देखा है। जवाब मिला कि इमारत खड़ी हो जाने दें, यहां दस-पंद्रह साल के तैयार सजावटी वृक्ष रातोंरात खड़े कर दिए जाएंगे। बीजों या थैलियों के पौधों को बाद में रोपते रहिएगा! मैं इसलिए चौंक गई कि मैंने सुना था कि एक तैयार वृक्ष की कीमत हजारों-लाखों में होती है। सरकार की तिजोरी को पहले भरना और फिर बेवजह खाली भी करते जाना, यह फलसफा तो मेरी समझ से बाहर है। रत्ती-रत्ती प्रगति का विचार भी बुरा नहीं, अगर एक निरंतरता बनी रहे। बूंद-बूंद बारिश रिसती है तो धरती को उर्वरा बनाती है। तेजी से तो बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने के कहर टूटते हैं। इसलिए कायाकल्प और तीव्रता का राग अलापना छोड़िए और कबीरा का दोहा गुनगुनाइये:
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, रितु आय फल होय।
’शोभना विज, पटियाला

 

 

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