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चीनी मंसूबे

चीन की युद्धोन्मत्तता जग जाहिर है। तिब्बत पर कब्जे से उसका मनोबल बढ़ा हुआ है और अब वह उसी तरह भूटान पर भी कब्जा करना चाहता है। डोकलाम को लेकर भारत और चीन के बीच तनातनी के मूल में यही चीनी मंसूबा है।
Author August 3, 2017 06:04 am
चीन ने कहा कि भारत ने निवेश के लिए सकारात्मक महौल बना लिया है

आबादी बनाम विकास
सब जानते हैं कि यदि जनसंख्या को नियंत्रित कर लिया जाए तो एक बेहतर समाज की कल्पना की जा सकती है। एक ऐसा समाज जहां सबके पास बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारा देश कितना ही विकास क्यों न कर रहा हो लेकिन बढ़ती जनसंख्या का बोझ देश को वापस उसी जगह खींच कर ले आता है जहां से वह उठा है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट सिर्फ परिवार नियोजन में कमी नहीं दर्शा रही है बल्कि भविष्य भी दिखा रही है कि अगर सरकार ने जल्द ही इस दिशा में भी ठोस कदम नहीं उठाए तो उसकी राष्ट्र हित की सभी योजनाएं विफल हो जाएंगी।
’सरफराज खान, दिल्ली

चीनी मंसूबे
चीन को पूरी दुनिया और खासकर एशियाई देशों पर भारत का बढ़ता प्रभाव रास नहीं आ रहा है। इसीलिए वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को सामरिक रूप से चौतरफा घेरने का प्रयास कर रहा है। चीन की युद्धोन्मत्तता जग जाहिर है। तिब्बत पर कब्जे से उसका मनोबल बढ़ा हुआ है और अब वह उसी तरह भूटान पर भी कब्जा करना चाहता है। डोकलाम को लेकर भारत और चीन के बीच तनातनी के मूल में यही चीनी मंसूबा है। उसने भारत को धमकी देना भी शुरू कर दिया है। लेकिन चीन को गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है जैसा वह सोच रहा है। भारत अपनी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर रहा है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि क्या चीन डोकलाम को लेकर घबरा रहा है या इसके पीछे कोई और वजह है। कहीं भारत के कारण चीन का वह सपना तो नहीं टूटने जा रहा है जिसके बाबत उसने कहा था कि पहाड़ में एक ही शेर रहेगा! आकलन यह है कि अगले कुछ सालों में भारत की अर्थव्यवस्था चीन के बराबर खड़ी हो जाएगी और इधर चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट शुरू हो चुकी है। भारत ने हाल ही में चीन को कई मसलों पर कड़ा रुख दिखाया है फिर चाहे पाकिस्तान तक बनने वाला इकोनॉमिक कॉरिडोर हो या फिर उसकी ओबीओआर (वन बेल्ट वन रोड) परियोजना। भारत सैन्य सामान में भले ही चीन से पीछे हो लेकिन सच्चाई यही है कि भारत के पास भी दुनिया की तीसरी बड़ी सेना है जिससे वह किसी भी हमले का सामना करने में सक्षम है।
’शिल्पा कुमारी, दिल्ली विश्वविद्यालय

बस्ते का बोझ
हाल ही में दिवंगत हुए वैज्ञानिक प्रो यशपाल ने 1992 में बच्चों की पीठ पर लदे बस्ते का बोझ तुरंत कम करने को कहा था। चौथाई शताब्दी बीत गई पर कम होने के स्थान पर बस्ते का वजन और बढ़ गया है। 2015 में महाराष्ट्र में हुए एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण का निष्कर्ष था कि स्कूल जाने वाले 58 फीसद बालक इस कारण पीठ दर्द और रीढ़ की विकृति से पीड़ित हो जाते हैं। इससे उनकी शारीरिक लंबाई भी पूरी नहीं बढ़ पाती। इतने गंभीर मसले पर विद्यालयों के प्रबंधन से लेकर सरकारों तक की आपराधिक उदासीनता हैरान करने वाली है। सबसे दुखद तो माता-पिताओं की चिंता-मुक्तता व निर्लिप्तता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बस्ते का वजन बालक के अपने भार के दस फीसद से अधिक नहीं होना चाहिए लेकिन 10-15 किलो वजन वाले बच्चे 5-6 किलो वजनी बस्ता ढोते दीखते हैं, जबकि वह एक-दो किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। अमेरिका में बालकों को बस्ते के भार से मुक्ति मिली हुई है। तमाम किताबें विद्यालय में रखी जाती हैं। शुद्ध पेयजल की व्यवस्था भी वहीं से होती है। वहां विद्यार्थियों का बाल्यकाल ‘कुलीगीरी’ की भेंट नहीं चढ़ता।
’अजय मित्तल, मेरठ

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