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बे-हद प्रदूषण

दिनभर की स्थिति में काफी बदलाव आ रहा है। दिन में जहां हवा 1600 मीटर की ऊंचाई तक होती है, वहीं शाम तक वह पैंतालीस मीटर तक आ जाती है।
Author November 15, 2017 04:27 am
दिल्ली में सुबह का कोहरा।

बे-हद प्रदूषण
पिछले रविवार को देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का एक्यूआई यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स एक ही दिन में 403 से बढ़ कर 460 तक पहुंच गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार उत्तर भारतीय शहर मुरादाबाद, गाजियाबाद, गुड़गांव और नोएडा में भी प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है। दिल्ली में हवा की गति एकदम थम-सी गई है और इसके साथ-साथ जितनी ऊंचाई तक हवा जानी चाहिए, वह नहीं जा पा रही। इस कारण शहर का प्रदूषण वहीं ठहर गया है। दिनभर की स्थिति में काफी बदलाव आ रहा है। दिन में जहां हवा 1600 मीटर की ऊंचाई तक होती है, वहीं शाम तक वह पैंतालीस मीटर तक आ जाती है।
दूसरी तरफ दक्षिण भारत के शहर तिरुवनंतपुरम में प्रदूषण का स्तर सबसे कम रहा है। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में प्रदूषण का स्तर 58 है, जिसके कई कारण हैं। जहां दिल्ली चारों ओर से जमीन से घिरी है, वहीं तिरुवनंतपुरम समंदर के नजदीक है, जिस कारण वहां हवा हमेशा बहती रहती है। इसलिए प्रदूषण के असर का पता नहीं चलता। तिरुवनंतपुरम में कचरा कोई समस्या नहीं है, क्योंकि सरकार यहां उतना कचरा नहीं बनने देती। यहां कचरा जलाया भी नहीं जाता। साथ ही उद्योगों को भी शहर से दूर रखा गया है। यहां ग्रीन प्रोटोकॉल के तहत कचरा, खासकर प्लास्टिक को कम करने की कोशिश हो रही है। भारत के दूसरे हिस्सों में पर्यावरण की स्वच्छता और प्रदूषण नियंत्रण के जो कार्यक्रम चल रहे हैं, वही कार्यक्रम यहां भी हैं, लेकिन यहां जनता को इसमें सीधे तौर पर शामिल किया जाता है।
हम कह सकते हैं कि उत्तर भारत में पर्यावरण संकट दक्षिण की अपेक्षा अधिक है। इस अंतर को खत्म करने के लिए हमें सबसे पहले सभी जगहों को विकसित करना होगा, ताकि अलग-अलग प्रदेशों से लोग शहरों का रुख करना बंद करें। इससे शहरों के बुनियादी ढांचों और प्राकृतिक संपदाओं पर दबाव पड़ना कम होगा। साथ ही सरकार को अक्षय ऊर्जा के स्रोतों पर भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है। हमें सोचना होगा कि हम पुराने शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के बजाय नए बेहतर शहर बनाएं, जहां कचरे का बेहतर प्रबंधन हो। जब तक नीति बनाने के स्तर पर जनता को शामिल नहीं किया जाएगा, प्रदूषण की समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता।
’विपिन डागर, सीसीएस विवि, मेरठ
लाचारी का शहर
पुराने समय से अब तक दिल्ली हिंदुस्तान की सियासत के केंद्र में रही है और अब शहर केंद्रित विकास के दौर के बाद राजनीति के साथ-साथ यह तमाम अन्य चीजों की भी राजधानी बन गई है। पूरब के कोलकाता जैसे महानगरों की बदहाली के बाद देश की एक और बड़ी जनसंख्या का ठिकाना दिल्ली बनी है। दिल्ली अब हिंदुस्तान की नई राजधानी-केंद्रित विकास का मॉडल हो गई है। विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र की राजधानी किसी राज्य से पानी के लिए घुड़की खाती है तो कहीं के खेत जलने से घुटने लगती है।
देश बनाते समय क्या हमने इतनी मजबूर और लाचार राजधानी की कल्पना की थी? दिल्ली एक संदेश है केंद्रित विकास का। तमाम दावों के बावजूद तरक्की के विकेंद्रीकरण न होने का। इस दमघोंटू माहौल में जबकि पूरा का पूरा शहर खाली करा लिया जाना चाहिए, हम सब यहीं जिए जा रहे हैं। हमें इस बदहवास-सी जिंदगी से निकलने की जरूरत है।
’अंकित दूबे, जेएनयू, दिल्ली

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