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क्रांति के बीज

20वीं शताब्दी के इतिहास पर साम्यवाद का बहुत असर रहा। हालांकि, जैसा मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा था, उस तरह साम्यवाद जमीन पर नहीं उतर पाया।
Author November 14, 2017 04:42 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

इस साल रूसी क्रांति का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है, लेकिन जिनके विचारों पर यह क्रांति हुई, क्या वे आज भी प्रासंगिक हैं? जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी में काफी कुछ लिखा। उनकी दो कृतियों ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ और ‘दास कैपिटल’ ने एक समय दुनिया के कई देशों और करोड़ों लोगों पर राजनीतिक और आर्थिक रूप से निर्णयात्मक असर डाला। रूसी क्रांति के बाद सोवियत संघ का उदय इस बात का उदाहरण था। 20वीं शताब्दी के इतिहास पर साम्यवाद का बहुत असर रहा। हालांकि, जैसा मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा था, उस तरह साम्यवाद जमीन पर नहीं उतर पाया। अंतत: साम्यवादी खेमा ढह गया और पूंजीवाद लगभग इस पूरे ग्रह पर छा गया। मार्क्स भूमंडलीकरण के पहले आलोचक थे। मार्क्स के विचार साम्यवाद की विफलता के बावजूद आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ और अपने अन्य लेखों में मार्क्स ने पूंजीवादी समाज में ‘वर्ग संघर्ष’ की बात की और बताया कि ‘कैसे अंतत: संघर्ष में सर्वहारा वर्ग पूरी दुनिया में बुर्जुआ वर्ग को हटा कर सत्ता पर कब्जा कर लेगा। ‘दास कैपिटल’ में उन्होंने इन विचारों को बहुत तथ्यात्मक और वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषित किया। मार्क्स ने उस सर्वग्राही पूंजीवाद के खिलाफ दार्शनिक तर्क रखे, जिसने पूरी मानव सभ्यता को गुलाम बना लिया। 20वीं शताब्दी में मजदूरों ने रूस, चीन, क्यूबा और अन्य देशों में शासन करने वालों को उखाड़ फेंका और निजी संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने दुनिया में बढ़ती गैर बराबरी के प्रति चेतावनी दी थी। 2007-08 की वैश्विक मंदी ने एक बार फिर उनके विचारों को प्रासंगिक बनाया।

पूंजीवाद के ‘पिता’ एडम स्मिथ के ‘वेल्थ आॅफ नेशन’ से उलट मार्क्स का मानना था कि ‘बाजार को चलाने में किसी अदृश्य शक्ति की भूमिका नहीं होती बल्कि मंदी का बार-बार आना तय है और इसका कारण पूंजीवाद में ही निहित है तथा पूंजीवाद के पूरी तरह खत्म होने तक ऐसा होता रहेगा।’ मार्क्स के सिद्धांत का एक अहम पहलू है- ‘अतिरिक्त मूल्य’। यह वह मूल्य है जो एक मजदूर अपनी मजदूरी के अलावा पैदा करता है। मार्क्स के अनुसार, ‘समस्या ये है कि उत्पादन के साधनों के मालिक इस ‘अतिरिक्त मूल्य’ को ले लेते हैं और सर्वहारा वर्ग की कीमत पर अपने मुनाफे को अधिक से अधिक बढ़ाने में जुट जाते हैं। इस तरह पूंजी एक जगह और चंद हाथों में केंद्रित होती जाती है। इसकी वजह से बेरोजगारी बढ़ती है और मजदूरी में गिरावट आती जाती है।’ इसे आज भी देखा जा सकता है।पूंजीवाद अपनी कब्र खुद खोदता है, मार्क्स की यह बात गलत है, बल्कि इससे उलट ही हुआ है, साम्यवाद खत्म हुआ तो दूसरी तरफ पूंजीवाद सर्वव्यापी हुआ है। भले ही मार्क्स अपनी भविष्यवाणी में विफल हो गए हों लेकिन पूंजीवाद के वैश्वीकरण की आलोचना करने में उन्होंने जरा भी गलती नहीं की। ‘कम्युनिस्ट घोषणा’ पत्र में उन्होंने तर्क किया है कि पूंजीवाद का वैश्वीकरण ही अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का मुख्य कारण बनेगा। 20वीं और 21वीं शताब्दी के वित्तीय संकटों ने ऐसा दिखाया भी है। यही कारण है कि भूमंडलीकरण की समस्याओं पर मौजूदा बहस में मार्क्सवाद का जिक्र बार-बार आता है।
’बबीता मलिक, सीसीएस यूनिवर्सिटी, मेरठ

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