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सेहत का योग

ऐसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में योग के लिए तीन लाख गुरुओं की आवश्यकता है। इससे पता चलता है कि हमारी योग को लेकर तैयारी अभी निम्न स्तर पर है।
Author June 28, 2017 04:43 am
लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर एक कार्यक्रम में योग करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (PTI Photo)

इक्कीस जून को तीसरा विश्व योग दिवस मनाया गया। भारत की इस अद्भुत प्राचीन कला की लोकप्रियता पिछले कुछ दशकोंमें बहुत तेजी से बढ़ी है। इस समय विश्व के सभी भागों में योग से लोग परिचित हो रहे हैं। स्वास्थ्य रक्षा के लिए योग का कोई विकल्प नहीं। योग की खोज भारत में की गई थी, यह बात विश्व ने जान और मान ली है। अब समय है भारत को इसमें वैश्विक नेतृत्व करने का। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोसफ नुए ने जिस ‘सॉफ्ट पावर’ की बात कही थी, उसमें भारत योग के माध्यम से बढ़िया भूमिका निभा सकता है।
इस समय सारा विश्व तनाव, अकेलेपन, अलगाव और हताशा जैसी मानसिक व्याधियों से जूझ रहा है। भारत योग के माध्यम से सारे विश्व को इन समस्याओं से मुक्ति दिलाने के साथ ही भारतीय संस्कृति के सुंदर पहलुओं से परिचित करा सकता है।

ऐसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में योग के लिए तीन लाख गुरुओं की आवश्यकता है। इससे पता चलता है कि हमारी योग को लेकर तैयारी अभी निम्न स्तर पर है। अगर भारत के लिए योग गुरु कम हैं तो विश्व को भारत कैसे योग प्रशिक्षक उपलब्ध कराएगा? कहने में भले अनुचित लगे पर भारत को आर्थिक लाभ की नजर से भी योग को देखना होगा। योग को अगर सेवा क्षेत्र का एक अभिन्न अंग मानते हुए, भारत इस क्षेत्र के लिए सही कदम उठता है तो इसमें अपार संभावनाएं छुपी नजर आएंगी। अगर भारत योग को आधुनिक तकनीक से जोड़कर उसकी आभासी कक्षाएं (वर्चुअल क्लास) शुरू करे तो विश्व भारत को अन्य देशों के मुकाबले वरीयता देगा। एक बार भारत सांस्कृतिक स्तर पर विश्व में बढ़त लेता है तो उसे वैश्विक नेता बनने से कोई नहीं रोक सकता। भारत को योग की शिक्षा प्राथमिक स्तर से शुरू करने के साथ, प्रशिक्षकों के लिए विशेष पाठ्यक्रम चलाने चाहिए।

अक्सर विविध वैश्विक रपटों में कहा जाता है कि भारत में महिलाओं की भागीदारी श्रमबल में बहुत कम है। योग गुरु के तौर पर भारतीय महिलाएं बढ़िया भूमिका निभा सकती हैं। इससे न केवल उनके स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा, साथ ही उन्हें आय भी हो सकेगी। इस तरह यह भी माना जा सकता है कि योग वैश्विक लिंगानुपात सूचकांक में भारत को उच्च स्थान दिलाने में सहायक होगा।
’आशीष कुमार, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

 

गरिमा के विरुद्ध
हमारे देश में जातिवाद खत्म करने की बातें तो बड़े जोर-शोर कही जाती हैं लेकिन हालत यह है कि मुल्क की तमाम राजनीति जातिवाद के दलदल में आकंठ डूबी हुई है। इसमें कदम-कदम पर जातीय गणित हावी रहता है। चुनावों में टिकट बंटवारे से लेकर मंत्री-मुख्यमंत्री चुनने तक में जातीय बिसात बिछी रहती है। आज नौबत यहां तक आ गई है कि राष्ट्रपति जैसे गरिमामय पद के चुनाव को भी नेताओं ने दलित बनाम दलित बना दिया है। ऐसे में कैसे उम्मीद लगाएं कि नेता देश से जातिवाद खत्म करने में सहायक होंगे? राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने तो राष्ट्रपति चुनाव को क्षेत्रवाद तक से जोड़ दिया है। उन्होंने ‘बिहार की बेटी’ दुहाई देकर इस पद की गरिमा और गिरा दी है। राष्ट्रपति किसी क्षेत्र का नहीं, पूरे देश का होता है। नेताओं से विनती है कि इस पद की गरिमा बनाए रखें और भविष्य में इससे ज्यादा निचले स्तर तक न जाएं।
’प्रदीप कुमार तिवारी, ग्रेटर नोएडा

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