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चौपाल: यादों की गली

आज के दौर में तो उस सुख को बस याद किया जा सकता है। हमारे पास स्मार्ट फोन है, पूरी दुनिया हमारी हथेली में सिमट कर रह गई है।
Author October 25, 2016 03:25 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

नरेंद्र जांगिड़ के लेख ‘चिठिया हो तो’ (दुनिया मेरे आगे, 8 अक्तूबर) को पढ़ते हुए एक ऐसा अतीत सामने आ खड़ा हुआ, जिसे याद करते हुए चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई। डाकिए की आवाज से हमारा पूरा परिवार परिचित था। दरवाजे पर पिताजी के नाम की आवाज सुनते ही हम भाइयों में चिट्ठी को लपक लेने की होड़ लग जाती थी। पूरा परिवार इकट्ठा हो जाता और चिट्ठी पढ़ने का काम शुरू होता। साथ ही लिखने वाले के विचारों की आलोचना का दौर भी। किसी पंक्ति पर पिताजी खुशी का इजहार करते तो किसी पर मां। पांच मिनट में पढ़ी जा सकने वाली चिट्ठी को पढ़ने और समझने में घंटा भर लग जाता।
आज के दौर में तो उस सुख को बस याद किया जा सकता है। हमारे पास स्मार्ट फोन है, पूरी दुनिया हमारी हथेली में सिमट कर रह गई है। फिर भी हम अकेले हैं, जिनकी चिट्ठी की हम हफ्तों प्रतीक्षा करते थे, आज उनसे रोज बात होती है। रिश्तों में अब वह गरमी कहां रह गई है! उस चिट्ठी वाले दौर को मन आज भी याद करता है। कभी-कभी मन सोच कर उदास हो उठता है कि कहीं हम बहुत कुछ पाने की होड़ में उसको खोते तो नहीं जा रहे जो हमारे समाज और संबंधों की थाती है और जिसे विकसित करने में हजारों वर्ष लगे। कितना अच्छा होता हम आगे तो बढ़ते, पर अपने अतीत को साथ लिए चलते। यादों की उस खू्रबसूरत गली में ले जाने के लिए लेखक का धन्यवाद।
’रवींद्र कुमार, कैथल, हरियाणा

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