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चौपाल- हिंसा के सहारे, सरोकार का सिनेमा

हमारे भारत की धरती ने महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों को जन्म दिया, जो सिर्फ अहिंसा के मार्ग पर ही चलना सबसे बेहतर मानते थे। इसे उन्होंने साबित भी किया।
Author October 10, 2017 02:18 am
नॉर्थ कोरिया लीडर किम जोन (एजेंसी)

हिंसा के सहारे
आज केवल हमारे देश में नहीं, दुनिया भर में किसी समस्या का समाधान बातचीत और विचार के जरिए करने के बजाय हिंसक तरीके से करना अकेला रास्ता मान लिया गया है। जबकि ऐसे उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं जिनमें बिना हिंसा के बड़ी लड़ाइयां जीती गई हैं। हमारे भारत की धरती ने महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों को जन्म दिया, जो सिर्फ अहिंसा के मार्ग पर ही चलना सबसे बेहतर मानते थे। इसे उन्होंने साबित भी किया। उसी धरती पर आज लोगों के आपस के मतभेद ने मनभेद का रूप ले लिया है। यह इतना बढ़ गया है कि लोग एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने और हिंसा करने में जरा भी नहीं हिचकते हैं। हिंसा की यह प्रवृत्ति आज वैश्विक होती जा रही है और बिना किसी बड़ी वजह के कोई देश दूसरे देश पर हमला कर देता है। फिलहाल अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच का तनाव क्या रूप लेगा, कहा नहीं जा सकता है। सवाल है कि क्या किसी के जेहन में यह नहीं है कि युद्ध का हासिल क्या होता है?

लोगों को यह समझने की जरूरत है कि बम या तोपों से हमला करने से केवल एक का ही नुकसान नहीं होता, बल्कि इसका परिणाम सभी को भुगतना पड़ता है। इस सबसे अंतिम तौर पर इंसानियत को नुकसान पहुंचता है। अगर हम खुद को इंसानी समाज का हिस्सा मानते हैं तो उसे बचाने की कवायद करनी चाहिए, न कि उसे नुकसान पहुंचाने की।
’वंदना सिंह, दिल्ली

सरोकार का सिनेमा
1983 में बनी फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ में कुंदन शाह ने भ्रष्टाचार जैसे विषय को हास्य का पुट देकर रोचक ढंग से पेश किया था। वह फिल्म चौंतीस साल बाद भी जनमानस के बीच लोकप्रिय है। ऐसी प्रतिभा के धनी कुंदन शाह का निधन भारतीय फिल्म उद्योग के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनके टीवी धारावाहिक वागले की दुनिया, नुक्कड़ आदि टीवी धारावाहिक भी आम आदमी के दर्द और अभाव को हल्के-फुल्के हास्य के रूप में पेश करते थे। लेकिन उसका असर गहरा होता था।
लेकिन आज बनने वाली ज्यादातर फिल्मों का मकसद क्या होता है, यह समझना मुश्किल होता है। आज की ज्यादातर फिल्मों की कहानियां और उसकी प्रस्तुति ऐसी होती हैं कि साधारण दर्शक उससे खुद को जोड़ नहीं पाता है। ये फिल्में संदेश के रूप में भ्रम जरूर परोसती हैं, लेकिन किसी मसले पर दृष्टि साफ नहीं करती हैं।
’संजय डागा हातोद, इंदौर

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