May 27, 2017

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पुनर्विचार की दरकार

सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उस नक्सली को वित्तीय सहायता के रूप में तुरंत पंद्रह लाख रुपए का चेक देते हुए पांच लाख रुपए बाद में देने की घोषणा की गई।

Author May 16, 2017 04:25 am
लेफ्टिनेंट उमर फैयाज का जनाजा ले जाते उनके परिजन।(Photo: ANI)

पुनर्विचार की दरकार

एक और दुर्दांत नक्सली के आत्मसमर्पण का समाचार पढ़ने मिला। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उस नक्सली को वित्तीय सहायता के रूप में तुरंत पंद्रह लाख रुपए का चेक देते हुए पांच लाख रुपए बाद में देने की घोषणा की गई। गौरतलब है कि इस आत्मसमर्पित कथित नक्सली पर कई लोगों की जघन्य हत्या और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप हैं। ऐसे व्यक्ति का सार्वजानिक मंच पर सम्मानित किए जाने जैसा स्वागत किसी भी प्रकार से उचित नहीं लगता। सरकार की यह नीति दोधारी तलवार भी सिद्ध हो सकती है। कुछ पुराने नक्सली विभिन्न कारणों, जैसे आर्थिक तंगी, हथियारों की कमी, स्वास्थ्यगत समस्या से मजबूर होकर आत्मसमर्पण कर सकते हैं, कर भी रहे हैं और नई पुनर्वास नीति के तहत लाभ ले रहे हैं। यह नीति देश के अनेक बेरोजगार, शोषित-वंचित युवाओं में एक गलत संदेश फैला सकती है। मानवता को शर्मसार कर देने वाले बड़े-बड़े अपराध करने के बाद भी अपराधियों का अपेक्षया कम कठोर सजा तथा आर्थिक सहायता-सम्मान पाना समाज का एक बड़ा हिस्सा स्वीकार नहीं कर पा रहा है।

भारत की न्याय प्रणाली में हर अपराध के लिए एक निश्चित दंड निर्धारित है। ऐसे में किसी खास नीति के अंतर्गत किसी व्यक्ति विशेष को छूट देना हमारी न्याय प्रणाली में लोगों के विश्वास को कम कर सकता है जो लोकतंत्र के लिए सर्वथा घातक होगा। लिहाजा, हमें वर्तमान पुनर्वास नीति पर फिर गंभीरता से विचार करना होगा। आत्मसमर्पित लोगों को मुख्यधारा में लाने के अन्य विकल्प तलाशने होंगे। नई पुनर्वास नीति बनाते समय उन वीरों के परिजनों की भावनाओं का भी विशेष ध्यान रखना होगा, जो देश की रक्षा करते हुए ऐसे देशविरोधी तत्त्वों के हाथों शहीद हुए हैं। हमें पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर भी विशेष ध्यान देना होगा ताकि वंचितों के जीवन स्तर में आमूल-चूल परिवर्तन आ सके।
’ऋषभ देव पांडेय, कोरबा, छत्तीसगढ़
विनाश की राह
सेना के अफसर उमर फैयाज सहित कई कश्मीरी पुलिसवालों की हत्या इस प्रदेश को फिर अस्सी-नब्बे के दशक का कश्मीर बना रही है। लेकिन इस बीच समय काफी बदल चुका है। अब इस्लामिक स्टेट के नाम पर आतंकवादी और अलगाववादी एकजुट और ताकतवर हो रहे हैं। अगर यही स्थिति कश्मीर में बनी रही इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए इस्लामिक स्टेट नौजवानों को दिग्भ्रमित कर आतंक की राह पर धकेल सकता है। तब क्षेत्रवाद और धार्मिक कट्टरता का अनैतिक गठजोड़ कश्मीर को विनाश की राह पर ले जाएगा। अब भी समय है कि कश्मीरी नेता टकराव और कट्टरता त्याग कर लोकतंत्र और साहिष्णुता का मार्ग अपनाएं, वरना धरती का यह स्वर्ग भी सीरिया बन जाएगा।
’कुंदन कुमार, अमदाबाद

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First Published on May 16, 2017 4:25 am

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