December 08, 2016

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चौपाल: हाशिये के लोग

तीसरी दुनिया के देशों में एक चौथी दुनिया भी है जिसकी आवाज कभी-कभी ही सरकार और मुख्यधारा के लोगों को सुनाई देती है।

Author नई दिल्ली | November 1, 2016 05:39 am
मजदूरी करता एक बालक।

तीसरी दुनिया के देशों में एक चौथी दुनिया भी है जिसकी आवाज कभी-कभी ही सरकार और मुख्यधारा के लोगों को सुनाई देती है। अक्सर इसकी आवाज बाजारवाद और झूठे प्रचार के तिलिस्म में गायब हो जाती है। भारत में भी यह बात सोलह-आने सही है। मोदी सरकार भारत के विकास की फिल्म के चित्रों में केवल उच्च और मध्य वर्ग के लोगों को तरजीह दे रही है। चौथी दुनिया में आने वाले गरीब, मजदूर, छोटे किसान, दलित, आदिवासी और संविदाकर्मियों के पात्र इस पूरी पटकथा में कहीं नजर नहीं आते।

दुनिया को बढ़ते भारत की छद््म तस्वीर दिखाई जा रही है जिसमें से असली भारत गायब है। बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण में भारत अपने पड़ोसियों से भी बदतर स्थिति में है। किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। वोटबैंक के ध्रुवीकरण के लिए धार्मिक उन्माद का सहारा लिया जा रहा है। इस घमासान के बीच न तो सरकार और न मीडिया को चौथी दुनिया के बारे में सोचने का समय है। जहां एक ओर सरकार केवल मध्य वर्ग और उच्च वर्ग के हितों को सर्वोपरि रख और गरीबों-शोषितों को दरकिनार कर नीतियां बना रही है वहीं दूसरी ओर धनतेरस और अक्षय तीज जैसे त्योहारों को भुना कर बाजारवाद की इस धारा में मीडिया भी भाव-विभोर हो गोते लगा रहा है।

अपने बच्चों को भरपेट खाना खिला पाना ही इन लोगों की होली-दीवाली है जिसके इंतजाम में ही इनकी सारी जिंदगी गुजर जाती है। लेकिन कभी न कभी तो इनकी नजर भी अखबारों में छपी भारी-भरकम आभूषण पहने उस लड़की पर पड़ ही जाती होगी जो विकसित भारत का लिपा-पुता चेहरा है!इतिहास गवाह है जब भी व्यवस्था परिवर्तन हुआ है तब-तब इसी चौथी दुनिया के लोगों की अहम भूमिका रही है। अगर इस दुनिया के लोगों को भी भारत के नागरिक समझ कर उनके विकास और मुख्यधारा में लाने के ईमानदार प्रयास नहीं किए गए तो एक बार फिर इस व्यवस्था में परिवर्तन होगा यह निश्चित है।
’अश्वनी राघव, उत्तमनगर, नई दिल्ली

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First Published on November 1, 2016 5:39 am

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