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कसौटी पर देशभक्ति

देशभक्ति को कसौटी पर डालने वाले इन्हीं वीसी महोदय ने चार महीने पहले कुछ नियमों का हवाला देकर लगभग पचासी प्रतिशत से अधिक सीटों को एक झटके में खत्म कर दिया।
Author August 2, 2017 06:01 am
JNU के VC प्रोफेसर जगदीश कुमार (Source- Twitter)

कसौटी पर देशभक्ति
जेएनयू के वीसी ने बीते दिनों सेना से एक पुराने टैंक की मांग की, जिसे परिसर में रख कर उससे विद्यार्थियों में देशभक्ति की भावना का संचार किया जा सके। विश्वविद्यालय की संरचना, इतिहास और योगदान से अनजान कुछ उत्साही लोगों ने इस मांग का समर्थन भी किया, वहीं बहुत सारे लोगों ने इसकी तीखी आलोचना की। इस कदम की आलोचना करने के एवज में कई लोगों ने वाट्स ऐप और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के जरिए लानत-मलामत झेली। इसके चलते कुछ लोगों को एक बार फिर जेएनयू को राष्ट्र विरोधी कहने का मौका मिला। जबकि असलियत इस हजार एकड़ के परिसर के भीतर रह रहे और किसी भी रूप में जुड़े लोग बेहतर जानते हैं!

देशभक्ति को कसौटी पर डालने वाले इन्हीं वीसी महोदय ने चार महीने पहले कुछ नियमों का हवाला देकर लगभग पचासी प्रतिशत से अधिक सीटों को एक झटके में खत्म कर दिया। इन पचासी प्रतिशत सीटों पर न तो पाकिस्तान का और न ही नक्सलियों का दावा होता! फिर इस निर्णय के खिलाफ अदालत गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए रही-सही कसर कोर्ट ने पूरी कर दी और बाकी बची पंद्रह फीसद सीटों पर होने वाले नामांकन को भी रोक दिया! इन फैसलों के बाद कुल मिला कर देश के इस बड़े विश्वविद्यालय की शोध-स्तरीय पहचान फिलहाल खत्म हो गई है और इस सत्र से व्यवहार में यह एक कॉलेज के रूप में बदल गया है। जबकि यह वही विश्वविद्यालय है, जिसे इसी राष्ट्रवादी सरकार ने आधिकारिक तौर पर ‘सर्वोत्तम विश्वविद्यालय’ का दर्जा दे रखा है।

ऐसे में एक बड़े संस्थान का मान घटाने वालों की ओर से देशभक्ति की ऐसी कवायदें शोभा नहीं देतीं। टैंक लगावाया जाए, युद्धक विमान रखवाए जाएं या फिर राडार ही लगा दिया जाए, इससे क्या हासिल होना है? सबसे बड़ी दिक्कत सीटों में कटौती को जब तक वापस लेकर माहौल को सामान्य नहीं किया जाता, वीसी के हर निर्णय से दिक्कत ही होगी। निर्णय अफसरों को करना है कि वे दिक्कतें कम करके व्यवस्था और सरकार में भरोसे के माध्यम से देश में आस्था जगाने का काम करते हैं या दिक्कतों पर देशभक्ति का मुलम्मा चढ़ा कर व्यवस्था के विद्रोही और देश की व्यवस्था से असंतुष्ट नागरिकों का एक तबका खड़ा करना चाहते हैं।
’अंकित दूबे, जेएनयू, नई दिल्ली
अपना गिरेबां
एक खबर के मुताबिक राजस्थान के भरतपुर में एक्सिस बैंक के एक एटीएम में सौ रुपए की जगह पांच सौ रुपए के नोट निकलने लगे। यह बात पूरे इलाके में फैल गई और वहां के निवासियों ने एक घंटे के भीतर एटीएम खाली कर दिया। इस दौरान जनता ने ‘अनुशासन’ बनाए रखा और सबने लाइन में लग कर शांति से मुफ्त का माल बटोरा। इस मामूली-सी दिखने वाली घटना के बड़े गहरे मायने हैं। ऐसी घटना से चाहे-अनचाहे हमारे ‘जगद्गुरु’ कहलाने वाले राष्ट्र का चरित्र उजागर हो जाता है। यह सच है कि एक छोटे-से कस्बे की घटना से हम पूरे राष्ट्र का आकलन नहीं कर सकते, लेकिन एक घंटे में ढाई सौ लोगों के समूह का यह नमूना इतना छोटा भी नहीं है कि इसे अनदेखा किया जा सके।

उस दिन लाइन में लगे हुए लोगों में दफ्तर जाने वाले लोग भी होंगे और दुकान या धंधा चलाने वाले लोग भी। वही चेहरे होंगे, जिन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते और ईमानदारी का चोगा पहने हुए हम अपने आसपास देख सकते हैं। लाइन में लगी वह भीड़ भारतीय आम आदमी का प्रतिनिधित्व करती हुई मालूम पड़ती है। तो क्या यह मान लिया जाए कि बहुत सारे लोग सिर्फ इसलिए ईमानदार बने हुए हैं या ईमानदार प्रतीत होते हैं कि उन्हें आज तक बेईमानी करने का मौका ही नही मिला?
’अनिल हासानी, भोपाल

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