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चौपाल: पीड़ा के परिदृश्य

पाक-अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नामक कार्रवाई पर इन दिनों हमारे दिलों में पाकिस्तान को मजा चखा देने की खुशियांं हिलोरें मार रही हैं।
Author October 11, 2016 04:37 am
सीमा पर सुरक्षा में लगे भारतीय जवान। (Source: PTI)

पाक-अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ नामक कार्रवाई पर इन दिनों हमारे दिलों में पाकिस्तान को मजा चखा देने की खुशियांं हिलोरें मार रही हैं। मोदीजी को चहुंओर से बधाइयां मिल रही हैं। पार्टी के कुछ वरिष्ठ जन भी मोदीजी की पीठ थपथपा रहे हैं कि शाबाश, उस रोज अपने भाषण में आपने जोर-शोर से जो कहा, वह कर दिखाया है! छप्पन इंची सीने को फिर से मापने की भी बातें पढ़ने को मिल रही हैं। इधर अपने सोशल मीडिया पर तो चटपटी टिप्पणियों और रसदार जुमलों की बाढ़-सी आ गई है। मेरे जैसे घिसे-पिटे लोग कुछ कहने से भय खा रहे हैं। खुद को समझा रहे हैं कि देखना, कहीं दोस्ती या मुहब्बत जैसे शब्द जुबान पर मत ले आना! दुश्मनी के इस खुशगवार माहौल में भला ऐसे मनहूस शब्दों का क्या काम? युद्ध छिड़ता है तो छिड़ने दो। सेना के जवान आखिर किस दिन के लिए होते हैं!

सोच का ही फर्क है। अपनी सरहदों के रखवालों को सलाम आप भी करते हैं, हम भी। आप दूरदर्शन पर उनकी जांबाजी के करतब देख कर, बैठे-बैठे अपना भी सीना तानने लगते हैं और हम यही सोच कर परेशान होते हैं कि दो पड़ोसी मुल्कों की सरहदों पर इस तरह जवान लहू क्यों टपकता है? अपने तीखे शब्द-बाणों से दुश्मनी की खाइयों को चौड़ा करते जाने वाले मोटे-मोटे खूंखार लोग तो कोई दूसरे होते हैं। दंभ से भरी इनकी बयानबाजियों का परिणाम होता है युद्ध जिसमें अनमोल जवानियां झोंक दी जाती हैं। ‘हम युद्ध के लिए तैयार हैं, होने दो, युद्ध से डरते नहीं हम’ घरों में बैठे हुए यह सब कहना कुछ मुश्किल नहीं है। इसलिए कि अपने सैनिकों की यातनाओं, उनके हताहत होने के वीभत्स दृश्यों से हम बेखबर बने रहते हैं। युद्ध होंगे तो शहादतें भी होंगी। आधिकारिक स्तर पर शवों को सलामियां देने की रस्में निभा दी जाएंगी। सोशल मीडिया पर भी शहीदों को सैल्यूट कहने वालों के जमघट लगते रहेंगे। पर इससे क्या होता है? अगर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो जाइये और जाकर गांव-देहात के उन गरीब औसत परिवारों की सुध लीजिये जिन्हें उनके हाल पर छोड़ कर वे नौजवान फौज में भर्ती हुए, कठिनतम स्थितियों में सरहदों पर तैनात रहे और फिर ‘लौट के घर न आये’।

अभी तो शुक्र है, जैसा कि पर्रिकर साहब फरमा रहे हैं कि इस सैन्य कार्रवाई में अपना एक भी जवान शहीद नहीं हुआ। चलो, उस पार हुए होंगे, इससे हमें क्या! दुश्मनी का एक हुनर यह भी है। मर मिटने वाले अपने हों तो कहा जाता है शहीद हुए और उस पार के हों तो कहते हैं कि मार गिराया! इस संदर्भ में मुझे अज्ञेय की एक कविता ‘युद्ध-विराम’ का खयाल आता है। कोई पंक्ति तो याद नहीं आ रही पर कविता की मूल संवेदना यही थी कि इंसानी पीड़ा के परिदृश्य दोनों तरफ एक जैसे होते हैं।

 
’शोभना विज, पटियाला

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