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चौपाल: कैसी छात्र राजनीति

तमाम शिक्षण संस्थाओं का शैक्षिक वातावरण धनबल और बाहुबल पर पूरी तरह आधारित इस डूसू चुनाव के चलते बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
Author नई दिल्ली | September 5, 2016 04:12 am
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर आइसा कार्यकर्ता दलित रिसर्च वेमुला रोहित की आत्महत्या के विरोध में केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बंडारू दत्तात्रेय का पुतला जलाते हुए। (पीटीआई फोटो)

महीने भर से दिल्ली विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध लगभग अस्सी कॉलेजों में छात्रसंघ (डूसू) चुनाव का जबर्दस्त खुमार सिर चढ़ कर बोल रहा है। इस खुमार के चलते छात्रसंघ चुनावों के बारे में लिंग्दोह कमेटी के तमाम प्रावधानों को फिर तार-तार किया जा रहा है। प्रत्येक कॉलेज की टायलेट सीट से लेकर, खिड़की, दरवाजे और दिल्ली की तमाम सड़कें, दीवारें, चौराहे, मेट्रो पिलर आदि सभी छात्र संगठनों के बैनरों-पोस्टरों-स्टीकरों से पटे पड़े हैं। रोजाना मुद्रित सामग्री के आधा क्विंटल से अधिक कागज तकरीबन हर कॉलेज के प्रांगण से मिल रहे हैं। इससे अंदाजा लगाइए कि पूरे दिल्ली विश्वविद्यालय, इसके कॉलेजों और दिल्ली की सड़कों पर कितना कागज बरबाद किया जा रहा होगा। यह न केवल धन का अपव्यय है बल्कि दिल्ली में स्वच्छता अभियान को ठेंगा दिखाना भी है। पर्यावरण प्रदूषण और शहर में गंदगी का बढ़ना एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है जिसमें छात्रसंघ चुनाव लड़ रहे खुद भाजपा के एबीवीपी से लेकर तमाम अन्य छात्र संगठन सहयोगी बन रहे हैं। दिल्ली सरकार और नगर निगम को दिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों की भी सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

तमाम शिक्षण संस्थाओं का शैक्षिक वातावरण धनबल और बाहुबल पर पूरी तरह आधारित इस डूसू चुनाव के चलते बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। कॉलेज की कक्षाओं से छात्र नेता के नेतृत्व में एक बड़ी-सी टोली बाहर निकलती है तो दूसरी आ घुसती है। कभी ढोल-नगाड़े बजाए जा रहे हैं तो कभी कॉलेज के अंदर ही छात्रों द्वारा नारे लगाए जाते हैं। कॉलेज परिसर में एक-एक छात्र को ढूंढ़ कर उससे हाथ मिलाना और लड़कियों के सामने नेताओं वाले अंदाज में हाथ जोड़ने का अभिनय जोरों पर है। इस सब के बीच विचार, विचारधारा, समाज और छात्र हित बारे में इन नेताओं की जुबान एक बार गलती से भी नहीं फिसलती है। फॉरच्यूनर, ऐक्सयूवी जैसी बड़ी-बड़ी गाड़ियां इन चुनावों में झोंकी जा रही हैं। दिल्ली की सड़कों पर लिंग्दोह कमेटी की सिफारिशों और बदरंगता विरोधी कानून को ठेंगा दिखाते हुए दिन के उजाले में भी हजारों ऐसी गाड़ियां चलती मिल जाएंगी जो डूसू के चुनावी पोस्टरों से पटी होंगी।
लिंग्दोह समिति के अनुसार छात्रसंघ चुनाव में एक प्रत्याशी के लिए जितना पैसा खर्च करने का प्रावधान किया गया था उससे कई गुना ज्यादा का तो ये केवल एक दिन में पेट्रोल फूंक देते हैं। फिर इनके द्वारा सिनेमाहॉल, वाटर पार्क, रेस्टोरेंट, कॉलेज कैंटीन आदि की बुकिंग के बेहिसाब खर्च का तो अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।

डूसू के इस चुनाव में एक प्रत्याशी बीस-पच्चीस लाख रुपए तक खर्च कर देता है। आज ये चुनाव छात्रों और उनके हितों के लिए न होकर सीधे-सीधे राजनीतिक पार्टियों के चुनाव बन गए हैं। इनमें भी जातिवाद अहम भूमिका निभा रहा है। अधिकतर प्रत्याशी राजनीतिक परिवारों से ही हैं। अब किस चुनाव अधिकारी की हिम्मत है कि वह छात्र नेताओं के नामों के साथ एबीवीपी, एनएसयूआई आदि के पोस्टरों से भरी दिल्ली के लिए इन्हें जिम्मेदार ठहरा कर कठघरे में खड़ा कर सके? लिंग्दोह समिति की सिफारिशों और बदरंगता विरोधी कानून के प्रावधान बहुत अच्छे हैं, पर वे कागजों तक सीमित होकर रह गए हैं। डूसू चुनाव के लिए ग्लैमर, पैसा, जाति, बाहुबल और राजनीतिक पृष्ठभूमि होना, इन पांच मूलमंत्रों के अलावा जब समाजपरक विचारधारा, छात्र हितों की चिंता, दिनोंदिन महंगी होती शिक्षा की फिक्र, शिक्षा के निजीकरण का विरोध, सबके लिए शिक्षा की जरूरत आदि मुद््दों पर छात्र संगठन सोचना शुरू करेंगे तभी सकारात्मक छात्र राजनीति की शुरुआत होगी।
’मुकेश कुमार, महावीर एनक्लेव, दिल्ली

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