June 23, 2017

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चौपाल: आजादी की सीमा, टूटते वर्चस्व

पार्श्वगायक सोनू निगम की आपत्ति पर उलेमा आग-बबूला हैं। वे इसे धार्मिक आजादी पर हमला बता रहे हैं।

Author April 20, 2017 13:13 pm
सिंगर सोनू निगम।

आजादी की सीमा

पार्श्वगायक सोनू निगम की आपत्ति पर उलेमा आग-बबूला हैं। वे इसे धार्मिक आजादी पर हमला बता रहे हैं। उन्हें इल्म नहीं कि संविधान में मिले धर्म-स्वातंत्र्य के अधिकार पर कई प्रतिबंध हैं। अनुच्छेद 25 के अनुसार यह सार्वजानिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन नहीं कर सकता। सन 2000 में केंद्र सरकार ने ध्वनि प्रदूषण संबंधी नियमों में प्रावधान किया था कि रात में ध्वनि-वर्धक यंत्रों का प्रयोग वर्जित रहेगा। जुलाई 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि धार्मिक स्थलों सहित कहीं भी पूरे भारत में रात दस बजे से सुबह छह बजे तक लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं होगा। यानी लोगों की नींद और विद्यार्थियों की पढ़ाई में खलल न पड़े, इसका विधि-सम्मत प्रबंध देश में मौजूद है। धार्मिक आजादी का तर्क यहां काम नहीं करेगा। हैरत और दुख की बात है कि अधिकांश राज्य सरकारें 2000 की नियमावली और 2005 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को लागू नहीं कर रही हैं। – अजय मित्तल, मेरठ

टूटते वर्चस्व

टूटते वर्चस्व के दौर के असर में जो होता है, उसी का आभास ‘बीच बाजार में लेखक’ (19 मार्च) लेख में हुआ। लोगों को क्या पढ़ना है, यह खुद उन्हें ही क्यों नहीं तय करने दिया जा रहा है… क्यों हर जगह सेंसर का ठेका कुछ लोगों ने ले रखा है! प्रकाशकों को अगर लग रहा है कि जो वे छाप रहे हैं, उसमें कुछ दिक्कत नहीं है तो उससे क्यों परेशानी होनी चाहिए! कायदे से प्रकाशित होने वाली उन रचनाओं को पढ़ना चाहिए और उनकी समालोचना करनी चाहिए। सतही आलोचना के चलते ही पितृसत्ता, वर्णगत और लैंगिक वर्चस्व टूटने की बौखलाहट देखी जा सकती है। ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ में सॉफ्टपोर्न दिख जाता है, जबकि उसमें तंज करती हुई भाषा में स्त्री के रोजमर्रा के अनुभव और बंद समाज को स्त्री के सांस लेने लायक जगह निकालने का प्रयास लेखिका नीलिमा चौहान ने किया है। अगर लेखक ‘लप्रेक’ और ‘गंदी बात’ किताब के संदर्भ को समझते हैं तो उन्हें ये रचनाएं सतही नहीं लगेंगी। अनुराधा बेनीवाल की ‘आजादी मेरा ब्रांड’ कुछ लोगों को इसलिए हजम नहीं हो रही कि वह एक लड़की ने लिखा है। अपने अनुभवों के आधार पर अपनी इच्छाओं-आकांक्षाओं को उसमें जगह दी है। सामाजिक संरचना को खारिज करने की कोशिश की है।

लेखक को शायद मालूम नहीं है कि ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ को केंद्र में रख कर सोशल साइट्स पर लड़कियों ने कितना लिखा है! ये सब लड़कियां समाज को, राजनीति को और पारिवारिक संरचना को बखूबी समझती हैं। वे आत्मनिर्भर हैं, पत्रकार है, रिपोर्टर हैं, शोधार्थी हैं। राजनीतिक वैश्विक हलचलों और स्त्रियों या दलितों से जुड़े मुद्दों पर वे अपनी राय मुखर रूप से रखती हैं। और कुछ लोगों की नजर में ये सब महिलाएं ‘बकबक करती हैं!’ – अंजलि, जेएनयू, दिल्ली

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First Published on April 20, 2017 1:55 am

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