ताज़ा खबर
 

कैसा समाजवाद

तवलीन सिंह ‘समाजवाद बनाम विकास का रास्ता’ (वक्त की नब्ज, 27 अगस्त) में लिखती हैं कि देश की आर्थिक दिशा अब भी समाजवादी है।
किसानों की कर्मभूमि रहा पंजाब आज उनकी मरनभूमि बन रहा है।

कैसा समाजवाद
तवलीन सिंह ‘समाजवाद बनाम विकास का रास्ता’ (वक्त की नब्ज, 27 अगस्त) में लिखती हैं कि देश की आर्थिक दिशा अब भी समाजवादी है। यह बात निराधार इसलिए है कि पिछले तीन साल (मोदी के नेतृत्व) में ही भारत के एक फीसद धनाढ्य परिवारों की संपत्ति देश की कुल संपत्ति के 48 फीसद से बढ़ कर 58.3 फीसद हो गई। जो अमीर हैं वे और अमीर हो रहे हैं, जो गरीब हैं वे और गरीब हो रहे हैं। आखिर यह कौन-सा समाजवाद है? दूसरी बात, उन्होंने पता नहीं किस सर्वे के आधार पर मनरेगा को खैरात बांटना कहा है! आठ घंटे फावड़ा चला कर मनरेगा में दिहाड़ी मिलती है। उसे तवलीनजी जैसे बुद्धिजीवी ही खैरात कह सकते हैं। इस दिहाड़ी को देने में सरकारी अफसर, ग्राम प्रधान और बैंक अधिकारियों में मिलीभगत है तो उसकी जांच-पड़ताल होनी चाहिए। लेकिन यह खैरात हरगिज नहीं है। देश में बेरोजगारी की भयावह तस्वीर तो लेखिका से भी नहीं छुपी होगी, इसलिए मनरेगा तो क्या उससे भी बड़ी और बेहतर योजना सरकार को लागू करनी चाहिए।

वे तर्क दे रही हैं कि मनरेगा के पैसे को सड़क, स्कूल, अस्पताल और पेयजल में खर्च करना चाहिए। इन सुविधाओं पर विजय माल्या वाला रुपया भी तो खर्च किया जा सकता है। अडानी और अंबानी को दी जाने वाली सब्सिडी भी जनसुविधाओं पर खर्च की जा सकती है। पर तवलीनजी के हिसाब से तो यह ठीक नहीं रहेगा क्योंकि वे समाजवाद विरोधी हैं! अगर उन्हें लेखकों में मुंशी प्रेमचंद और हरिवंशराय बच्चन की कमी खल रही है जो कि जायज भी है, तो तब तक राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ पढ़ लीजिए।
’राजेश कुमार, न्यू मंगलापुरी, नई दिल्ली

इंदौर की नजीर

मध्यप्रदेश की वाणिज्यिक-औद्योगिक राजधानी इंदौर को भारत सरकार ने देश का सबसे स्वच्छ नगर घोषित किया है। लगभग चालीस लाख जनसंख्या वाले शहर में प्रतिदिन दो हजार टन कूड़ा उत्पन्न होता है। इस कूड़े का वर्गीकरण कर उसका निस्तारण जिस वैज्ञानिक पद्धति से किया जा रहा है, वह दिल्ली और अन्य सभी शहरी क्षेत्रों के लिए सबक है। कहीं कूड़े के ढेर या पहाड़ नहीं हैं। सर्वाधिक परेशान करने वाले प्लास्टिक कचरे को वहां घनीकृत ठोस रूप देकर सड़क-निर्माण के लिए सप्लाई किया जाता है। दिन में तीन बार सड़कें बुहारी जाती हैं। रात में उनकी धुलाई की जाती है।

हमारे देश में गंदगी फैलाने के लिए आर्थिक दंड का प्रावधान और उसकी तत्काल वसूली की दक्ष व्यवस्था पहली बार वहीं लागू हुई। इंदौर के मेयर और नगर आयुक्त के कठिनतम परिश्रम और नागरिकों को प्रेरित करने की उनकी क्षमता ने यह चमत्कार कर दिखाया। वहां का इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ मैनेजमेंट (आइआइएम) इस सबका अध्ययन कर देश-दुनिया को बताने जा रहा है।
’अजय मित्तल, मेरठ

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.