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परदे के पार

फिर एक दिन संग्राम का विजेता अपने लाव-लश्कर के साथ आया और सिंहासन पर विराजते ही बस छा गया।
Author December 27, 2016 02:29 am
फिर एक दिन संग्राम का विजेता अपने लाव-लश्कर के साथ आया और सिंहासन पर विराजते ही बस छा गया।

अपने स्कूल के दिनों की एक बात याद है। जब कभी स्कूल में पुराने के प्रस्थान पर किसी नए अध्यापक या मुख्य अध्यापक के आने की खबर मिलती और यह भी सुनने को मिलता कि सुधर जाओ, अबकी यहां एक सख्त बंदा आ रहा है, जो तुम जैसों को बंदा बना कर रख देगा तो कुछ घबराहट होने लगती थी। शैतानों को शायद न भी होती हो, लेकिन आम विद्यार्थी थोड़ा सहम जाते थे। ढाई साल पहले चुनावी संग्राम के समय, जब देश का प्रांगण एक रणभूमि जैसा लग रहा था तो कुछ ऐसी ही स्थिति आम जनता की थी। बहुत सारी आवाजों के बीच एक खास आवाज अक्सर अलग से सुनाई पड़ती थी। इस बुलंद आवाज को सुन कर जनता विमुग्ध भी होती थी, पर सोच में भी पड़ जाती थी कि न जाने अब उसके जीवन में ऐसा क्या नया होने वाला है!

फिर एक दिन संग्राम का विजेता अपने लाव-लश्कर के साथ आया और सिंहासन पर विराजते ही बस छा गया। जैसा कि एक कुशल प्रचारक के सहज गुण होते हैं, कंठ में सूरमा जैसा नाद, दिमाग में सबको पछाड़ कर नंबर वन कहलाने का उन्माद और भीतर हर समय बेचैनी से भरा एक सवाल कि सत्तर बरस होने को आए, अभी तक यहां कुछ भी नहीं हुआ! देश का यह कैसा हाल कर दिया है चोरों और कामचोरों ने! बस तभी महत्त्वाकांक्षा के साज पर राग ‘विकास’ के वीररस-प्रधान सुर छेड़ कर माहौल को बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। उजड़े और खंडहर हुए देश का ‘कायाकल्प’ करने के लिए रणभेरी बजा दी गई। भोली-भाली मंत्रमुग्ध जनता अपने नेता के हर बोल पर ताली दे-देकर समां बांधने लगी! राग दरबारी के सुर भी इतने दमदार इससे पहले कभी नहीं रहे थे।

समय गुजरने लगा। बीच-बीच में जनता के चेहरे पर कुछ मायूसी नजर आई। जनता को लगा कि यहां तो लच्छेदार बातों का काले जादू जैसा कोई सम्मोहन उस पर हुआ जा रहा है! इस बीच दरबार में एक अहम फैसला भी लिया गया कि देश के कोने-कोने में जाकर सरकार की उपलब्धियों का पूरे जोर-शोर से ढिंढोरा पीटा जाए। थोड़ी देर को ही सही, लोगों का मन बहल जाएगा। ऐसा बार-बार होता रहा। जब भी जनता के मोहभंग की जरा-सी भनक मिलती या अपनी ही छवि सुर्खियों से थोड़ा इतर होने का खतरा महसूस होता, अचानक बम-विस्फोट जैसी कोई स्थिति रच दी जाती, जिससे कि जनता को यह ध्यान ही न रहे कि वह क्या सोच रही थी और छवि भी अपनी जगह बरकरार! यह कहानी अब भी बदस्तूर जारी है। मेरे देश की जनता कितनी भोली है!
’शोभना विज, पटियाला

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