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बैसाखी के बजाय

तमिलनाडु हमें बताता है कि आरक्षण अगर सही ढंग से लागू किया जाए तो बेहतरीन परिणाम देता है।
Author February 1, 2017 02:41 am
एनसीबीसी ने सिफारिश की है कि एक कानून पारित किया जाए जिसके तहत व्यापारिक संस्थानों, अस्पतालों, ट्रस्टों सहित अन्य निजी संस्थाओं में ओबीसी उम्मीदवारों के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया जाए।

तमिलनाडु हमें बताता है कि आरक्षण अगर सही ढंग से लागू किया जाए तो बेहतरीन परिणाम देता है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार हमें बताते हैं कि आरक्षण का राजनीतिक इस्तेमाल कितना खतरनाक होता है। खैर, आरक्षण अभी केवल शासक वर्ग के लिए सेफ्टी वाल्व का काम कर रहा है। अपने फायदे के लिए शासक वर्ग लगातार रोजगार के अवसर कम करता जा रहा है और निजीकरण को बढ़ावा दे रहा है। इसलिए जन-रोष को दबाने और जातिगत रूप से जनता को बांटने के लिए आरक्षण का प्रयोग कर रहा है। दस प्रतिशत दलितों और पिछड़ों को अपनी लूट में हिस्सा देकर नब्बे प्रतिशत दलितों और पिछड़ों की आवाज बंद करा दी गई है। साथ ही पूंजी की मार से जो नया सवर्ण सर्वहारा पैदा हुआ है, उसे ही प्रतिक्रियावादी बना दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो आरक्षण के द्वारा ऐसा माहौल तैयार किया गया है जिससे गरीब सवर्णों को लगता है कि दलित आरक्षण के कारण उनकी जगह खाए जा रहे हैं जबकि दलितों को लगता है कि आरक्षण कम है और इसे उनकी बेहतरी के लिए और बढ़ा देना चाहिए।

इस लड़ाई में कोई इस ओर ध्यान नहीं देता कि अंधे मुनाफे की हवस में शासक वर्ग लगातार रोजगार को कम किए जा रहा है। वह आरक्षण का इस्तेमाल केवल अपने फायदे के लिए कर रहा है, जिसमें मायावती, पासवान, लालू और आठवाले जैसे तथाकथित दलित-पिछड़े वर्ग के मसीहा भी खूब मलाई खा रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आरक्षण खराब होता है। आरक्षण एक स्वस्थ लोकतंत्र का प्रतीक होता है। लेकिन भारत में स्थितियां इतनी पेचीदा कर दी गई हैं कि इसका समाधान केवल एक जाति-विरोधी और आर्थिक न्याय की मिली-जुली क्रांति के द्वारा ही संभव है।
’मुरारी त्रिपाठी, कानपुर

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