December 04, 2016

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चौपाल: कठघरे में रेलवे

पहले की दुर्घटनाओं की ठोस जवाबदेही तय न किए जाने, दोषियों को यथोचित दंड न दिए जाने या लीपापोती से आगे सुधार के रास्तों में बाधाएं आती हैं।

Author November 22, 2016 05:15 am
रेल हादसे के कारणों का अभी तक पता नहीं लग पाया है, हालांकि सूत्रों ने आशंका जताई कि ऐसा रेल फ्रैक्चर के कारण हुआ है। रेलवे की तरफ से जो हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है, वह इस प्रकार है: झांसी-05101072, उरई-051621072, कानपुर-05121072 , पुखरायां- 05113-270239।

पुखराया (कानपुर) के पास हुई रेल दुर्घटना में 145 से अधिक यात्रियों की मौत और दो सौ से अधिक के घायल होने से देश स्तब्ध है। मृतकों के आश्रितों को मुआवजे और घायलों के लिए राहत राशि की घोषणा की गई है। रेलमंत्री ने दुर्घटना के कारणों की जांच और दोषियों को कठोर दंड देने की बात कही है। हर रेल दुर्घटना के बाद यही सब होता है। पुरानी दुर्घटनाओं के तुलनात्मक आंकड़े आते हैं, पूर्व रेलमंत्री व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के रेल दुर्घटना पर त्यागपत्र के उदाहरण को याद किया जाता है, रेलमंत्री से त्यागपत्र मांगा जाता है लेकिन पूर्व में हुई दुर्घटनाओं की जांच रिपोर्ट और उन पर की गई कार्रवाई की कोई चर्चा नहीं होती। पहले की दुर्घटनाओं की ठोस जवाबदेही तय न किए जाने, दोषियों को यथोचित दंड न दिए जाने या लीपापोती से आगे सुधार के रास्तों में बाधाएं आती हैं।

रेल बजट के समय सरकारों द्वारा सुविधाओं और सुरक्षा इंतजामों के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। विपक्ष भी इन मांगों को रखता रहा है, पर ये हादसे सब पोल खोल देते हैं। इसी वर्ष सरकार ने रेल बजट को अलग से न रखने का निर्णय लिया है, इससे रेल सुविधा व सुरक्षा के मुद्दे पर संसद में जो थोड़ी-बहुत औपचारिक चर्चा होती थी, उसकी भी संभावनाएं क्षीण हो गई हैं। भारतीय रेल भारत की आत्मा है, इसमें प्रतिदिन यात्रा करने वाले ढाई करोड़ लोगों में हम विविधताभरी विशेषता से युक्त लघु भारत के दर्शन करते हैं। भीड़ में धक्के खाते, तकलीफ झेलते, रोते-गाते, मुस्कराते, गुनगुनाते हर रंग और मिजाज को हम देख सकते हैं।

रेलवे हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है। अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारे उपयोग व उपभोग की सामग्री को जिस मात्रा, सुगमता और सुरक्षा से रेल पहुंचाती है, उसका कोई सानी नहीं है। हमारे गण व तंत्र के लिए इतने उपयोगी व अहम यातायात माध्यम के प्रति सरकारों का रवैया इतना उदासीन क्यों है? क्यों चोरी-छुपे, टुकड़े-टुकड़े में रेलवे के निजीकरण के प्रयास किए जा रहे हैं? अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल के दामों में 60-70 प्रतिशत तक की गिरावट के बावजूद यात्री व मालभाड़े में छूट न देने पर भी लोग खामोश रहे। इसी पृष्ठभूमि में परोक्ष रूप में किराया वृद्धि पर भी लोग खामोश रहे तो इसका एकमात्र कारण था कि यह एक सुगम, सुलभ और वहनीय साधन है।

इस दुर्घटना के परिप्रेक्ष्य में अभी तक की रेल दुर्घटनाओं पर एक श्वेतपत्र सरकार को जारी करना चाहिए, जिनमें दुर्घटना के कारणों, दुरुस्ती के प्रयासों, दिए गए दंड तथा भविष्य के लिए सुरक्षा उपायों के प्रयासों का भी जिक्र हो। साथ ही यह भी उल्लेख होना चाहिए कि रेलवे की क्षमता कितनी है, क्षमता का कितना प्रयोग हो रहा है, कितने क्षेत्रों में अब तक रेल नहीं पहुंची है, कितनी पटरियों को बदलने की जरूरत है, कितने पुलों की हालत जर्जर है व उनकी जिंदगी पूरी हो चुकी है, कितने समपार पर फाटक / चौकीदार नहीं हैं, सुरक्षा में क्या-क्या कमियां हैं। भारतीय रेल भारत की आन-बान और शान है, यह भारत की जनता की जरूरत है, इसे प्रत्यक्ष लाभ-हानि के गणित से नहीं चलाना चाहिए, इसके परोक्ष लाभ कल्पनातीत हैं।

यह खेदजनक है कि देश के लिए आवश्यक रेल सुविधा के विस्तार, सुविधा, सुरक्षा के लिए संसाधनों की कमी का बहाना बनाया जाता है जबकि मेट्रो रेल व अमदाबाद-मुंबई जैसे पहले से ही विकसित केंद्रों के बीच एक लाख करोड़ की बुलेट ट्रेन के लिए शीर्ष पदों पर विराजितों को कोई संकोच नहीं है। यह भी एक गंभीर सवाल है कि जिन क्षेत्रों में अब तक रेल नहीं पहुंची है वे अधिकतर आदिवासी अंचल ही क्यों हैं? यातायात का एक ध्येय वाक्य है ‘गति से पहले सुरक्षा’। क्या नीति नियंता इसे ध्यान में रखेंगे?
’सुरेश उपाध्याय, गीता नगर, इंदौर

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First Published on November 22, 2016 5:15 am

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