December 02, 2016

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चौपाल: अधूरी कवायद

दुकानदार ग्राहकों को पहचानते हैं, इसलिए उधार भी मिल जाता है। मेरे विचार से महानगरों और बड़े शहरों के लिए करेंसी की सीमा छोटे शहरों से अधिक निर्धारित हो सकती थी।

Author November 21, 2016 03:09 am
बैंक के सामने मौजूद भीड़।

पांच सौ और एक हजार रुपए के पुराने नोटों को बंद करने का मोदी सरकार का निर्णय भारत की अर्थव्यवस्था, राजनीति, समाज और आम लोगों के जीवन को कितना, कब और कैसे बदलेगा यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन इस अचंभित कर देने वाले निर्णय से देश के ज्यादातर लोग किसी न किसी रूप में प्रभावित तथा परेशान हैं। सरकार का यह कदम साहसिक कहा जा सकता है, लेकिन इसके लिए उसे बेहतर तैयारी भी करनी चाहिए थी। सरकारी बयानों के अनुसार यह कार्रवाई कालेधन, जाली करेंसी और पाक-पोषित आतंकवाद को समाप्त करने की दिशा में आवश्यक थी। लोग भी मान रहे हैं कि भ्रष्टाचार की असाध्य हो चुकी बीमारी के इलाज के लिए शल्य-क्रिया आवश्यक थी। लेकिन शल्य-क्रिया से पहले और बाद में रोगी के हित में बहुत सारी जरूरी सावधानियों का ध्यान रखा जाता है, ताकि दर्द कम हो, संक्रमण न फैले और रोगी की जान को खतरा न हो।

कायदे से सरकार को नोट के आकार में बदलाव नहीं करना था। अगर अपरिहार्य था तो एटीएम मशीनों के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में फेरबदल समय रहते कर लेना चाहिए था। पर्याप्त मात्रा में सौ रुपए तक के पुराने नोट और 500-2000 रुपए के नए नोट छप कर तैयार होने थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। करेंसी की जितनी मांग हो रही है, उसके अनुपात में बहुत कम लोगों को मिल पा रहा है। लंबी लाइनों में खड़े बुजुर्ग और गोद में बच्चों को पकड़े महिलायें, बीमार-लाचार लोग- ये दुखद और चिंताजनक दृश्य हैं। शादियों के लिए अपने ही रुपए न मिल पाना, इससे भी ज्यादा दुखद है। गंभीर रोगों से जूझ रहे रोगियों और उनके परिजनों का करेंसी के अभाव में तड़पना। संपत्ति का अधिकार नागरिकों का मौलिक अधिकार न सही, एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है। यह वित्तीय आपातकाल भी नहीं है। तब क्यों नागरिकों को इतना कष्ट उठाना पड़ रहा है। जो लंबी लाइनों में इंतजार करते-करते मर गए, उनका जीवन तो वापस नहीं आ सकता!

हमारे शहर का आकार और आबादी कम है और छोटे शहरों में खर्चे भी बड़े शहरों की अपेक्षा काफी कम होते हैं। टैक्सी-आॅटो का भाड़ा नहीं देना पड़ता, क्योंकि पैदल आना-जाना होता है। दुकानदार ग्राहकों को पहचानते हैं, इसलिए उधार भी मिल जाता है। मेरे विचार से महानगरों और बड़े शहरों के लिए करेंसी की सीमा छोटे शहरों से अधिक निर्धारित हो सकती थी। इसके अलावा चिकित्सा खर्च और शादी-विवाह के लिए ज्यादा नकदी की सुविधा के बारे में पहले सोचा जा सकता था। इसके बावजूद यह सच है कि सरकार का यह कदम भारत को स्वच्छ, पारदर्शी, भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं बना देगा। सरकार को रिश्वतखोरों, बैंकों का कर्ज हजम करने वालों, मिलावटखोरों, कर चोरी करने वालों आदि के विरुद्ध भी कड़े तेवर दिखाने होंगे और लालफीताशाही भी खत्म करनी होगी।
’कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा, उत्तराखंड

 

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First Published on November 21, 2016 3:07 am

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