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विकास की मरीचिका

कोई हिंदू और कोई मुसलिम नहीं होता। दो जून की रोटी ही उनका धर्म और मजहब होती है।
Author May 18, 2017 05:40 am
सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

नगालैंड के दीमापुर से उत्तर प्रदेश के आगरा तक एक महिला अपने बच्चों के साथ सिर्फ इसीलिए चली आई कि उसे महाजन का दो हजार रुपए का कर्ज चुकाना था जो उसने अपने दिवंगत पति के अंतिम संस्कार के लिए लिया था। उसे अपने बेटे की आजादी चाहिए जिसे महाजन ने कर्ज की एवज में बंधुआ बना रखा है। पैसा जमा करने के लिए वह अपने बच्चों को सड़क पर पड़ी जूठन खिलाने में भी संकोच नहीं करती क्योंकि उसकी आंखों में केवल बेटे की आजादी का संकल्प है। कई लोगों को शायद इस घटना पर विश्वास न हो क्योंकि उन्होंने सिर्फ नेताओं और मीडिया द्वारा दिखाई मजबूत और विकसित इंडिया की छद््म तस्वीर देखी है। गरीब-मजदूरों, छोटे किसानों और कमजोर तबकों वाला असली भारत नहीं देखा जिसकी पहली और आखिरी प्राथमिकता अपना और अपने परिवार का पेट पालना रहती है। वहां कोई हिंदू और कोई मुसलिम नहीं होता। दो जून की रोटी ही उनका धर्म और मजहब होती है।

प्रियंका चोपड़ा के गाउन को बेशक लोगों ने मीडिया में बहुत देखा होगा पर सड़कों पर बलात्कार की शिकार होती महिलाओं की खबरें मीडिया में ज्यादा नहीं देखी होंगी चाहे वह खबर रोहतक की हो, गुरुग्राम की हो या भोपाल की । ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा बस टीवी और अखबारों के विज्ञापनों के लिए था जिससे भारतीयों को लगे कि देश की महिला अब रात को भी आजादी से सुरक्षित घूम सकती है। देश जो बदल रहा है! कपिल मिश्रा मीडिया में ऐसे छाए हैं जैसे देश की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हो। नेता भी धड़ाधड़ बयानबाजी कर रहे हैं पर उस समय यही नेता मौनी बाबा बने बैठे थे जब तमिलनाडु के किसान हफ्तों तक नंग बदने अपने मृत संबंधियों के नरमुंडों के साथ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे। उन्हें शायद वे भारत के नहीं लगे। वे शायद किसी और देश के थे!

देश के लिए शहीद होने वाले सैनिक के परिवार को जब योगीजी सहायता राशि देने जाते हैं तो प्रशासन वहां एसी, पर्दे, कालीन और तौलिये पहुंचा देता है ताकि उन्हें असली भारत न दिख जाए। अजीब विडंबना है, जिन जवानों के सुख-दुख में सारा देश शरीक होता है उन्हें सरकार न ढंग का खाना दे पा रही है न शहीद का दर्जा। क्या फर्क पड़ता है कि तेईस महीने से ये सैनिक जंतर-मंतर पर धरना दे रहे हैं। वह अलग बात है कि राजनेताओं ने सेना के नाम पर देश की भावुक जनता को और भावुक कर वोट खींचना सीख लिया है।
पिछले कुछ वर्षों से बेरोजगारी अपने चरम पर है पर आज का युवा अब आंदोलन नहीं करता क्योंकि उसके पास समय नहीं है, इंटरनेट जो मुफ्त है। आंदोलन करना अब गुजरे जमाने की बात है, अब वह परंपरा नहीं रही। अब आंदोलन कर कोई ‘देशद्रोही’ नहीं बनना चाहता! वैसे अपनी भड़ास युवा कहीं न कहीं निकाल लेते हैं, कहीं गोरक्षक बनकर, कहीं दूसरे मत के छात्रों को पीटकर, कहीं पत्थर फेंक कर।लोग अरबों रुपए लेकर देश से भाग रहे हैं और मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी में एक रुपए का इजाफा करके सरकार इतरा रही है। कहीं खाने की कमी के चलते बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं और कहीं करोड़ों की सब्सिडी देकर योगा केंद्र खोले जा रहे हैं जिससे मोटापा कम हो सके। महंगाई पर देशव्यापी आंदोलन करने वाला विपक्ष सत्ता में आते ही महंगाई को विकास का सूचक बताने लगता है। तेल महंगा, पेट्रोल महंगा, रेल महंगी, अनाज महंगा। गरीबों-किसानों की जान के अलावा सबने अपनी कीमतें बढ़ाई हैं चाहे नेता हो या अभिनेता।गरीब और गरीब, अमीर और अमीर, बस यही एक सत्य है। विकास और समृद्धि केवल अमीरों के हिस्से में आ रही हैं। गरीब पहले की तरह आटे-दाल के जुगाड़ में अपना जीवन खपा देता है। हमेशा की तरह सत्ता केवल अमीरों की तस्वीरें दिखा कर विकास की छद््म तस्वीर पेश करती रहती है और विशेष महारत वाला मीडिया ऐसा माहौल बना देता है कि उसकी चकाचौंध में सब खो जाता है, सब कुछ!
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, उत्तमनगर, नई दिल्ली

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