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चौपाल: आलू की फैक्ट्री

आलू हमारी तरह धर्म निरपेक्ष है। हर सब्जी का धर्म उसका अपना धर्म है। हर सब्जी के रंग में डूब कर वह उसके साथ एकाकार हो जाता है।
Author October 13, 2016 04:08 am
आलू।

उन्होंने यदि कह भी दिया कि वे किसानों के लिए आलू की फैक्ट्री लगाएंगे तो इसमें हंगामा करने की क्या बात है! उन्होंने एक बस एक बात कही और आप हैं कि उसका बतंगड़ बनाने पर तुले हैं। जब विश्व में कृत्रिम दिल बनाने के प्रयास हो रहे हों तब आलू किस खेत की मूली है! वह भी फैक्ट्री में बनाया जा सकता है। चाहे उनकी जुबान ही क्यों न फिसल गई हो लेकिन उनके कथन को सकारात्मक रूप से लिया जाना चाहिए। हां, यह बात अवश्य है कि ‘पटाटो’ जैसी इतनी पापुलर चीज के बारे में इतने पापुलर व्यक्ति का अज्ञान संदेह अवश्य पैदा करता है। भारतीय भोजन में आलू की लोकप्रियता निर्विवाद है। एक तरह से इसे राष्ट्रीय कंद के खिताब से नवाजा जा सकता है। कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानियों से लेकर लीडरकिंग लालू प्रसाद के गुण-गौरव तक में आलू की उपस्थिति चर्चित रही है। हमारे भोजन में आलू ठीक उसी प्रकार उपस्थित रहता है, जैसे शरीर के साथ आत्मा, आतंकवाद के साथ खात्मा, नेता के साथ भाषण, यूनियन के साथ ज्ञापन, मास्टर के साथ ट्यूशन, वोटर के साथ कन्फ्यूजन, टेलर के साथ टेप, भूगोल के साथ मैप, पुलिस के साथ डंडा और इलाहाबाद के साथ पंडा। अर्थात भोजन है तो आलू है। आलू है तो समझो भोजन की तैयारी है!

आलू हमारी तरह धर्म निरपेक्ष है। हर सब्जी का धर्म उसका अपना धर्म है। हर सब्जी के रंग में डूब कर वह उसके साथ एकाकार हो जाता है। बैंगन, पालक, गोभी, टमाटर, बटला, दही, खिचड़ी, पुलाव आलू सभी में अपने को जोड़े रखता है। आपसी मेल-मिलाप हमारी परंपरा रही है, यही संस्कार हमारे आलू में भी देखे जा सकते हैं।विनम्रता और दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार खुद को ढाल लेना हमारे चरित्र की विशेषताएं होती हैं। उबलने के बाद आलू भी हमारी तरह नरम और लोचदार होकर अपने आपको समर्पित कर देता है। चाहो तो आटे में गूंथ कर पराठा सेंक लो या मैदे में लपेट कर समोसा तल लो अथवा किसनी पर कस कर चिप्स का आनंद उठा लो! आलू की नियति से हमारी नियति बहुत मिलती है। राजनीतिक नेता और पार्टियां जिस तरह हमारी भावनाओं को उबाल कर उनके पराठें सेंकते हैं, समोसा तलते हैं या चिप्स बनाकर वोटों के रूप में उदरस्थ करते हैं, उसी तरह आलू हमारे पेट में जाता है।

परम मित्र साधुरामजी ने बताया कि जहां हम आलू के दीवाने हैं, वहीं रूसियों को मूली, गाजर और गोभी बहुत पसंद है। इसी तरह अमेरिकियों को शकरकंद खाने का बहुत शौक होता है। पिछले दिनों जब हमने साधुरामजी के यहां भोजन ग्रहण किया तो उन्होंने एक नई सब्जी परोसी जिसका नाम था- ‘इंडो-रशिया फ्रेंडशिप वेजिटेबल’ (भारत-रूस मित्रता सब्जी)। जब मैंने वह खाई तो मुझे आलू, मूली और गोभी का मिला-जुला जायका आया। मित्रता की खुशबू दिलों से होकर सब्जियों तक महसूस कर मुझे अपने आलुओं पर गर्व हुआ। अब तो शकरकंद में आलू मिलाकर बनाई गई सब्जी भी हम बड़े चाव से खा रहे हैं, परोस रहे हैं। विश्व में यह एक मिसाल भी है जब हमारा देश, दुनिया में हमारी आलू-प्रवत्ति का कायल हुआ है।

संभवत: उन्होंने हमारे सर्वप्रिय आलू के और अधिक विकास पर ध्यान दिया और आकांक्षा व्यक्त की है कि अब आलू की फैक्ट्री भी शुरू की जानी चाहिए। नया विचार रखा है, जेम्स वाट ने केतली से निकली भाप को देख कर जो विचार दिया था उससे आगे चल कर रेल गाड़ियां दौड़ने लगीं। ‘नवोन्मेष विचार’ ही भविष्य के किसी अन्वेषण का आधार बनता है। बुद्धिमान और हुनरमंद लोग घरों में डिटर्जेंट के पैकेटों और वनस्पति तेल के पीपों से भैंस का दूध दुह रहे हैं, कोई आश्चर्य नहीं जब फैक्ट्रियों से निकले आलुओं से समोसे बनाए जाने लगें।
’ब्रजेश कानूनगो, गोयल रीजेंसी, इंदौर

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