December 11, 2016

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चौपाल: हवा में जहर

बहुत पहले ‘प्रदूषण’ हिंदी के शब्दकोश का ही कोई एक शब्द रहा होगा।

Author नई दिल्ली | November 8, 2016 05:22 am
दिल्ली एनसीआर में धुंध से बचने के लिए मास्क की मांग अचानक तेजी बढ़ गई।

बहुत पहले ‘प्रदूषण’ हिंदी के शब्दकोश का ही कोई एक शब्द रहा होगा। आम बोलचाल में तो दूर की बात है, पढ़ते या पढ़ाते समय भी इस शब्द से कभी यों निकट का वास्ता रहा हो, मुझे याद नहीं। ज्यादा पीछे न जाएं, इक्कीसवीं सदी के भारत की ही बात करें तो आज प्रदूषण हमारी शब्दावली का सर्वाधिक चर्चित और पढ़ा-सुना जाने वाला शब्द हो गया है । ‘एह परदूशन नहीं मित्तरो, घुग्गू एह खतरे दा बोले’– एफएम पटियाला के सांध्यकालीन कार्यक्रम ‘महक मालवे दी’ में ठेठ देहाती लहजे में गाये गये ऐसे गीतों को सुन कर इसी तरह का अहसास होता है

जानलेवा प्रदूषण की शुरुआत तो दशहरे के साथ ही हो जाती है जब जगह-जगह रावण-दहन से हवा में बारूद का जहर घोल दिया जाता है। उधर पटाखों और धमाकों के साथ दिवाली आ रही होती है और इधर खेतों में धान की ‘पराली’ जल रही होती है। इस समय प्रदूषण का दैत्य अपने सबसे भयंकर रूप में अवतरित होता है। बाग-बगीचों की नगरी के नाम से मशहूर पटियाला में अगर यह हालत है तो देश की राजधानी का कैसा हुलिया बनाती होगी दिवाली, यह अनुमान लगाना कुछ मुश्किल नहीं है और इस बार तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

धुंध की मोटी चादर से घिरी दिखी राजधानी दिल्ली

रवींद्रनाथ ठाकुर का भावपूर्ण प्रार्थना-गीत अक्सर याद आता है- ‘देश की माटी, देश का जल, हवा देश की, देश के फल, पुण्य हों’। किसी का सुझाव था कि इस दिशा में युवाओं को एक सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। पर इन्हें दिशाबोध कराए कौन? खतरनाक धमाकों से वायु-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण बढ़ाने वाले अधिकांशत: युवा ही तो हैं। बच्चे और बूढ़े तो नहीं हो सकते। पर्यावरण से जुड़ी राष्ट्रीय समितियां और प्राधिकरण एड़ी-चोटी का जोर लगा लें, जब तक सरकारें खतरनाक पटाखों पर प्रतिबंध नहीं लगातीं, तब तक प्रदूषण का संकट टलने वाला नहीं। परंपरा और प्रतीकात्मकता के नाम पर जब तक त्रेता वाला रावण जलता रहेगा और विजय का जश्न मनाने के नाम पर दिवाली के धमाके होते रहेंगे, तब तक प्रदूषण का यह कलयुगी रावण भी इसी तरह सिर उठाता रहेगा।
’शोभना विज, पटियाला

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First Published on November 8, 2016 5:20 am

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