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वादे और इरादे

गजब का राष्ट्र है ये। जहां करोड़ों को भरपेट खाना नसीब नहीं हो रहा, वहीं इस देश के कर्णधार संसद के गलियारों से देशवासियों का ‘डाइट चार्ट’ बना रहे हैं!
Author February 21, 2017 05:30 am
सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा…। ये पंक्तियां सुन कर मैं बचपन से जवानी की दहलीज तक आ गया लेकिन आज तक इस गीत की शब्दश: सत्यता प्रमाणित नहीं हो पाई। किसके लिए यह हिंदुस्तान अच्छा है? गौर कीजिए तो पता चलेगा कि आजादी के सत्तर वर्ष के सफर में क्या हम गरीबों को दो जून की रोटी, बेघरों को छत या निर्वस्त्रों को वस्त्र दे पाए हैं? टीवी चैनलों के स्टुडियो में बैठ कर शब्दों की धमाचौकड़ी मचाने वाले तथाकथित राष्ट्रभक्तों की वास्तविक दशा यह है कि वे स्वयं भी पूरे दिन के दो घंटे बिना एसी के नहीं रह सकते। लेकिन टीवी की बहसों में गरीब, मजलूम और शोषितों के असल शुभचिंतक बन जाते हैं। देश की गरीबी के आंकड़े बढ़ाने-घटाने का काम मात्र कागजों पर होता है। आज जिस देश में कम से कम पचास रुपए में एक वक्त का कामचलाऊ पेट भरने का भोजन नसीब होता हो, वहां सरकारें बत्तीस रुपए के आंकड़े पर पहुंचे लोगों को अमीर मानती हैं!

गजब का राष्ट्र है ये। जहां करोड़ों को भरपेट खाना नसीब नहीं हो रहा, वहीं इस देश के कर्णधार संसद के गलियारों से देशवासियों का ‘डाइट चार्ट’ बना रहे हैं! आजकल खबरों के सागर में डुबकी मारिए तो भूखे, नंगों से ज्यादा इस देश के नेताओं और अवाम पर पाकिस्तान के बारे में बात करने का शौक हावी है। गजब का माद्दा दिखा रही हैं ये सरकारें, जो भूल जाती हैं कि मध्यवर्गियों के इस देश में इंसान दिनभर जद्दोजहद और मेहनत सिर्फ अपनी मजबूरी छुपाने के लिए करता है और उसकी मजबूरियां रोटी, कपड़ा और मकान की आस में ताउम्र आंख-मिचौली करती हैं।हमारे अखबार और टीवी चैनल रोज की रिपोर्टों से जताने में लगे हैं कि भारत और पाक के पास कितने परमाणु हथियार और मिसाइल हैं। लेकिन जनाब कोई राष्ट्र तब तक समृद्ध नहीं बनता, जब तक कि उसकी जनता समृद्ध न हो जाए। 1947 से अब तक के विकास और उसमें भी दिल्ली पर नजरें गड़ाइए और सोचिए कि देश की राजधानी, जिसके विश्वस्तरीय होने का दंभ बारंबार राजनेताओं द्वारा भरा जाता है, आजादी के 70 वर्षबाद भी वहां के चुनाव बिजली, पानी जैसी मूलभूत जरूरतों को आगे रख कर लड़े जाते हैं। भारत की विडंबना देखिए कि हर चुनाव में कोई इसे विश्वशक्ति या विश्व नेता या विश्वगुरु बनाने के हसीन सपने दिखा कर पांच वर्षों के अज्ञातवास में चला जाता है और फिर अगली बार इसी सपने में कुछ और तड़का लगा कर हमारे सामने परोस कर मलाई खाने निकल पड़ता है।

दरअसल, जादू कुछ नहीं होता, सिर्फ जादूगर द्वारा आपकी आंखों में झोंकी गई धूल ही जादू है, उसी तरह दुनिया के सबसे बड़े जादूगर तो ये राजनेता हैं। विकास के पहलू की बातों में लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ मीडिया की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। हमारे नीति-निर्धारक और मीडिया के बंधु कभी सर्द रातों या बारिश की बौछारों या फिर जून की गर्म रातों में निकलें और देखें कि देश का भविष्य किसी फुटपाथ पर भूखे पेट, नंग-धड़ंग, आसमानी छत के सहारे किसी रईस की आलीशान गाड़ियों से कुचले जाने का इंतजार करता मिल जाएगा!
’संतोष कुमार, बाबा फरीद कॉलेज, बठिंडा

 

 

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