ताज़ा खबर
 

धर्म और राजनीति

इस सारे घटनाक्रम में धर्मगुरुओं और राजनीतिक दलों का जो समीकरण सामने आया है उसमें आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
Author August 31, 2017 05:29 am
राम रहीम अब तक के बाबाओं से काफी अलग हैं।

धर्म और राजनीति

गुरमीत राम रहीम के मामले में डेरा और राजनीतिक दलों का जो गठजोड़ सामने आया है उससे जनता चकित है और उसका राजनीतिक दलों से भरोसा उठने लगा है। सन 2002 में प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखी गई एक बेनाम चिट्ठी और एक टीवी चैनल के स्टिंग आॅपरेशन के बाद सभी को डेरे में साध्वियों से बलात्कार और कई लोगों की हत्याओं की जानकारी सबके सामने आ गई थी और मामला न्यायालय में भी चला गया था। इसके बावजूद सभी राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के लिए डेरे में हाजिरी लगाते और बाबा के चरण छूते रहे। पिछले लोकसभा चुनावों से पहले भी सभी मुख्य पार्टियों ने बाबा की शरण ली और अंत में डेरे ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया।  हाल में आए सीबीआई कोर्ट के फैसले से पूर्व डेरा अनुयायियों के लामबंद होने, हथियार इकट्ठा करने की सूचनाओं के बावजूद हरियाणा सरकार का लचर रवैया साफ-साफ अपना वोटबैंक बचाने की कोशिश मात्र था। हद तो तब हो गई जब धारा 144 लगने के बावजूद लाखों लोग शहर में जमा हो गए जिसके लिए उच्च न्यालालय ने सरकार को सियासत छोड़ अपना दायित्व निभाने की हिदायत भी दी। इस सारे घटनाक्रम में धर्मगुरुओं और राजनीतिक दलों का जो समीकरण सामने आया है उसमें आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जनता यह पूछ रही है कि क्यों कोई भी पार्टी पीड़ित महिलाओं और मारे गए लोगों के साथ नहीं खड़ी दिखाई दी? क्यों वे एक बलात्कारी को बचाने में लगी रहीं?

राजनीति में धर्म और धर्म में राजनीति जब-जब आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप करने लगती हैं तब अंजाम ऐसा ही होता है। धर्म और राजनीति के घालमेल से अजीब परिस्थिति बनती है जो काफी समय से बनी हुई है पर इसका वर्तमान स्वरूप व्यथित करने वाला है। धर्म और राजनीति का अविवेकी मिलन दोनों को बर्बाद करता है। ऐसे ही मिलन से कट्टरवाद, सांप्रदायिकता और हिंसा का जन्म होता है। इसीलिए दोनों का मर्यादा में रहना आवश्यक है। अमर्यादित सत्ता चाहे वह राज्य की हो या धर्म की, खुद को सबसे बड़ा समझने लगती है और केवल अपना स्वार्थ साधना उसका एकमात्र ध्येय हो जाता है। उन्हें स्वयं के हित राष्ट्र के हित से ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगने लगते हैं, जैसा राम रहीम प्रकरण में हुआ।यदि राजनीतिक दल केवल अपनी सत्ता बचाने के लिए ऐसी लापरवाही दिखाएंगे तो भले ही इनका वोटबैंक बचा रहे पर धर्मनिरपेक्षवाद और देश का भविष्य अंधकार में ही रहेगा। धर्मनिरपेक्षता का भविष्य आज राजनीति की प्रकृति से प्रभावित होता है। यदि स्वच्छ राजनीति का प्रचलन होगा तभी भविष्य में हम एक विकसित और शांत भारत की कल्पना कर सकते हैं लेकिन मौजूदा परिदृश्य में यह सोचना भी कल्पनामात्र है।
’अश्वनी राघव ‘रामेंदु’, नई दिल्ली

अपना दामन
बाबाओं ने अपने प्रवचनों में रावण, कंस, दुर्योधन, हिरण्यकश्यप आदि के कुकृत्यों और उनके सर्वनाश की कथा न जाने कितनी बार अपने अनुयायियों को सुनाई होगी। एक कहावत याद आ रही है- पर उपदेश कुशल बहुतेरे। काश, अपने प्रवचनों पर ये बाबा स्वयं भी चले होते तो इन दिनों सलाखों के पीछे न होते!
’शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग