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चौपाल: शांति का सम्मान

सांतोस को पिछले सालों के उनके प्रयासों के कारण यह पुरस्कार सच में शांति का पुरस्कार बन गया है।
Author October 8, 2016 05:14 am
सीरिया के अलेप्पो शहर का कफ्र हमला गांव। (रॉयटर्स फोटो)

शांति की तलाश में उठे हुए हाथ कभी बेकार नहीं जाते। एक छोटे-से दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया के गृहयुद्व से पीड़ित लाखों लोगों की दुआओं का असर यह है कि वहां के राष्ट्रपति हुआन मानुअल सांतोस को इस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। सांतोस को पिछले सालों के उनके प्रयासों के कारण यह पुरस्कार सच में शांति का पुरस्कार बन गया है। नोबेल शांति पुरस्कार समिति के सदस्यों की यह राय भी बड़े अर्थ रखती है कि यह पुरस्कार सांतोस की उन कोशिशों का फल है जो फार्क जैसी जत्थेबंदी के लिए एक ऐसा मानवीय तंत्र खड़ा कर पाए ताकि गरीबी और जीने की इच्छा से लबरेज लोक जीवन का आंनद ले सके।

वेनेजुएला और कोलंबिया के बीच संघर्ष और कोलंबिया के वामपंथी विद्रोही गोरिल्ला युद्ध में पारंगत लड़ाकों के साथ वार्तालाप करके उन्हें शांति की मेज पर लाना एक बड़ा कार्य था जिसमें सांतोस को क्या नहीं करना पड़ा। हालांकि इस शांति समझौते को जनमत के द्वारा ठुकरा दिया गया है पर यह जानना अति आवश्यक है कि शांति समझौते में फार्क जैसी संस्था को लेकर जो राय बनी है वह इस क्षेत्र में शांति के प्रयासों का एक नया इतिहास बना सकती है। हुआन मानुअल सांतोस ऐसे व्यकित हैं जो विश्व पटल पर एक पढ़े-लिखे प्रधान गिने जाते हैं। 1951 में राजधानी बागौता में पैदा होने वाले सांतोस एक बड़े राजनीतिक घराने से संबंध रखते हैं। उनके चाचा ईडीआरडो सांतोस मनतोजो कोलबिंया के 1938 से लेकर 1942 तक राष्ट्रपति रहे हैं और देश के सबसे बड़े समाचारपत्र ‘एल तीमोतो’ के संस्थापक हैं।

सांतोस ने भी इसी समाचार के संवाददाता के तौर पर कार्य करते हुए दुनिया को देखा और समझा है। लंदन स्कूल आफ इकॉनोमिक्स में पढ़ने और 1981 में हावर्ड विश्वविद्यालय से डिग्री लेने वाले सांतोस ने कई मोर्चों पर कार्य किया है। 2002 में वे मंत्री बने। 2005 में सोशल पार्टी आफ नेशनल यूनिटी में योगदान दिया। फार्क जैसे वामपंथी संगठन के साथ 2008 मार्च में पहली बार उन्होंने शांति के लिए समझौते के प्रयास किए। 2010 में सांतोस राष्ट्रपति बने। 2 लाख 80 हजार शरणार्थियों और गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को मुख्यधारा में लाना राष्ट्रपति सांतोस का विशेष कार्य रहा है। इसलिए नोबेल समिति ने उनके इन प्रयासों को सराहा है। नोबेल समिति यह मानना भी उचित है कि राष्ट्रपति सांतोस का कार्य इराक, सीरिया और अफगानिस्तान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बाकी विश्व की नजर ही कोलंबिया जैसे छोटे देश पर नहीं पड़ती। विश्व मीडिया में भी उसे वह स्थान नहीं मिला जो अन्य संघर्षों को प्राप्त होता है इसलिए कोलंबिया जैसे हालात में यदि लाखों लोग शांति से जीना शुरू करते हैं तो यह सचमुच करिश्मा ही कहा जाएगा।
’कृष्ण कुमार रत्तू, डीएवी यूनिवर्सिटी, जालंधर

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