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चिराग तले अंधेरा

अब भी भारत के जन-गण बिना किसी सांसद की चिरौरी किए संसद की कार्यवाही देखने नहीं जा सकते
Author December 12, 2016 01:19 am
मंगलवार (29 नवंबर) को राज्यसभा में विपक्ष के हंगामे का एक दृश्य।

बीते दिनों लोकसभा की कार्यवाही देखने पहुंचा। किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी सरकार, लाचार स्पीकर और वेल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के सांसदों का व्यवहार और ठप्प हो रहे विधायी काम-काज को देख कर गहरी निराशा हुई। निराशा दो और चीजों को लेकर हुई। पहली यह कि जब हम रिसेप्शन की कैंटीन में खाने पहुंचे तब नकद पैसे नहीं थे लिहाजा, कार्ड और पेटीएम से पैसे चुकाने को आश्वस्त थे। वहां ऐसा करने से साफ मना कर दिया गया। उस जगह से नकदी के अभाव में भूखे पेट वापस आना पड़ा, जहां से सरकार ‘कैशलेस इकोनॉमी’ की बड़ी-बड़ी बातें कर रही है। मतलब चिराग तले अंधेरा है।

दूसरी निराश करने वाली बात यह थी कि अब भी भारत के जन-गण बिना किसी सांसद की चिरौरी किए संसद की कार्यवाही देखने नहीं जा सकते। पहले तो अपने वोट से किसी को संसद भेजो और फिर उसी की कार्यवाही देखने के लिए उनसे चिरौरी करो! क्या यह प्रजातांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है? मोदी सरकार को यह सामंती लगने वाली व्यवस्था खत्म करनी चाहिए और एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे राष्ट्रपति भवन की तर्ज पर कोई भी आम नागरिक बिना किसी की पैरवी के कुछ पैसों का भुगतान कर संसद घूम सके। मेरी इन दो निराशाओं का समाधान क्या 283 सीटों वाली पूर्ण बहुमत की सरकार कर सकेगी?
’अंकित दूबे, जनेवि, नई दिल्ली

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