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संकट में उद्यान

इन समस्याओं को समझे बिना न इन पार्कों में मौजूद वन्यजीवों की रक्षा हो सकती है और न ही संरक्षण का अचूक रास्ता ही निकल सकता है।
Author December 26, 2016 02:58 am
जंगली सुअर

जिम कार्बेट राष्ट्रीय पार्क में जब पर्यटक पूर्वी द्वार से प्रवेश करते हैं तो छोटे-छोटे नदी-नाले, शाल के छायादार वृक्ष और फूल-पौधों की एक अनजानी-सी सुगंध उनका मन मोह लेती है। इस पार्क का इतिहास काफी समृद्ध है। अंग्रेजों ने इस पार्क का लकड़ी के लिए काफी दोहन किया और रेलगाड़ियों की सीटों के लिए टीक के पेड़ों को भारी संख्या में काटा। 1934 में संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैलकम हैली ने इस संरक्षित वन को जैविक उद्यान घोषित कर दिया। इस पार्क को 1936 में गवर्नर मैलकम हैली के नाम पर ‘हैली नेशनल पार्क’ का नाम दिया गया था। यह भारत का पहला राष्ट्रीय और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पार्क बना। लेकिन मौजूदा समय में पार्क की हालत बेहद खराब है।

पर्यटन के लिहाज से देखें तो यहां शेर, हाथी, भालू, बाघ, सूअर, हिरन, चीतल, सांभर, पांडा, काकड़, नीलगाय और चीता आदि वन्य प्राणियों की भरमार है और पर्यटकों के लिए ये आकर्षण का कारण हैं। इसी तरह, इस वन में अजगर और कई प्रकार के सांपों के अलावा कभी यहां छह सौ के लगभग रंग-बिरंगी पक्षियों की प्रजातियां भी दिखाई देती थीं। लेकिन आज अवैध रूप से शिकार के कारण देश में बाघों, शेरों और हाथियों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। तस्करों का वर्चस्व, बाढ़, आग, ढीला प्रशासन तंत्र, अनियंत्रित पर्यटन और गैरजिम्मेदार पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी, राज्य और वन विभाग की उदासीनता और स्थानीय लोगों की कम दिलचस्पी या उदासीनता वगैरह इनकी मुख्य समस्याएं हैं।

इन समस्याओं को समझे बिना न इन पार्कों में मौजूद वन्यजीवों की रक्षा हो सकती है और न ही संरक्षण का अचूक रास्ता ही निकल सकता है। जो पहले वैध था, वह अब अवैध जरूर हो गया, लेकिन शिकार अब भी जारी है। जिम कार्बेट पार्क में हर महीने-दो महीने में किसी बाघ या किसी हाथी के मरने, मारे जाने के समाचार आते रहते हैं। पिछले एक दशक में यह क्रम बढ़ गया है। वहां जाने वाले पर्यटकों का व्यवहार एक अलग समस्या है। यहां भी वे वही व्यवहार करते हैं, यानी नशाखोरी, शोर, कैंप फायर और मनमाफिक कहीं भी पार्क में निकल पड़ना, यहां तक कि वर्जित हिस्सों में भी।

वन्यजीवों के सामान्य जीवन में इस तरह का हस्तक्षेप न स्वीकार्य हो सकता है और न क्षम्य। होटलों के मालिक राजनीतिक तौर पर इतने प्रभावशाली हो गए हैं कि कोर-जोन में सड़क-निर्माण करवा लेते हैं और उन्होंने कार्बेट पार्क के कोसी नदी की तरफ खुलने वाले सीमांत में इतने अधिक होटल-रिसोर्ट वगैरह बना लिया है कि इससे रामनगर की तरफ के बाघ क्षेत्र के कॉरीडोर में स्थायी व्यवधान पड़ गया है। कार्बेट पार्क के पूर्वी हिस्से के जो जीव सदियों से कोसी में पानी पीते थे, उनका मार्ग भी होटलों के कारण बंद हो गया है।विश्व के हर कोने से एक उम्मीद के साथ यहां पर्यटक आते हैं कि उन्हें हर प्रकार के पशु-पक्षी और पार्क की सुनहरी हरियाली दिखेगी। लेकिन अब उनकी उम्मीद टूटती जा रही है।
’संतोष कुमार, बाबा फरीद कॉलेज, बठिंडा

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