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चौपाल- विफलता के वीर

जीडीपी के गोता लगाने की पूरी संभावना डॉ मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के दौरान व्यक्तकर दी थी। हम उनका डट कर मजाक बना रहे थे।
Author September 5, 2017 04:33 am
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (फोटो-पीटीआई)

विफलता के वीर

पंचकूला में तीस से ज्यादा मौतों और करोड़ों रुपए की संपत्ति नष्ट होने के बाद भी खट्टर साहब पहले से कहीं अधिक महफूज हैं। उन्हें नहीं लगता कि प्रशासन से कोई भारी चूक हुई है। बच्चों के लिए चलती ट्रेन में महज एक ट्वीट पर दूध उपलब्ध कराने वाले रेलमंत्री यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा को लेकर इतने सजग नजर नहीं आए। 309 से ज्यादा नौनिहालों की जीवन डोर कट जाने का पछतावा लखनऊ के 5 कालिदास मार्ग पर कहीं नजर नहीं आया। अगाथा क्रिस्टी के रहस्यमय उपन्यासों की तरह व्यापम की चालीस से अधिक मौतों के राज, राज ही रह गए। किसानों पर गोलीबारी चूंकि दिग्विजय सिंह ने भी करवाई थी इसलिए हिसाब बराबर मान लिया गया! किसी काले बादल की हिम्मत नहीं हुई कि वह श्यामला हिल्स पर छा जाए! नोटबंदी के दौर में बैंकों की कतार में खड़े-खड़े गुजर गए तकरीबन 150 लोगों के लिए 7 रेसकोर्स (अब लोक कल्याण मार्ग) से अफसोस का कोई संदेश नहीं आया।

जीडीपी के गोता लगाने की पूरी संभावना डॉ मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के दौरान व्यक्तकर दी थी। हम उनका डट कर मजाक बना रहे थे। अब वाकई में हमारी विकास दर 5.7 रह गई है। क्या चलन के हिसाब से हमें इसके लिए इस बार भी कांग्रेस को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए? बिहार में हमने जनमत खो दिया था पर हम फिर भी येनकेन अपने आपको सत्तानशीन देखना चाहते थे। नीतीश बाबू ने हमारा सपना साकार किया। बदले में हमने देश के एकमात्र (?) भ्रष्ट लालू परिवार को सीबीआई से निपटवा दिया। पनामा पेपर्स से नवाज शरीफ को लेने के देने पड़ गए, हमारे यहां उस पर कचौरियां दबा कर खाई गर्इं। कालेधन को लेकर हमारी परिभाषा अपने और परायों के लिए अलग-अलग हैं। इस दस्तावेज में हमारे यहां के भी रसूखदार नाम रोशन किए हैं। जब तक सर्वोच्च अदालत संज्ञान नहीं लेगी तब तक हमारी नींद नहीं खुलेगी!

पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका कब चीन के खासम-खास हो गए हमें पता ही नहीं चला। घूमने को हमने पूरी दुनिया घूम ली। उन देशों में भी हो आए जिनका परोक्ष रूप से भी भारत से कोई लेना-देना नहीं है। कितना विदेशी निवेश आया, कुछ पता नहीं। हमें तो कैसे भी अमेरिका की नजरों में चढ़ना था और उस फेर में अपने बरसों पुराने भरोसेमंद साथी रूस को नजरअंदाज कर दिया। परिणाम, कभी पाकिस्तान को पास बैठाने के काबिल न समझने वाला मास्को पाकिस्तान को हथियार बेचने लगा। चूंकि हमें नेहरू का आदतन विरोध करना था तो हमने उस गुटनिरपेक्ष आंदोलन को भी पलीता लगा दिया जिसकी वजह से भारतीय उपमहाद्धीप में हमारी धाक हुआ करती थी। चिंता मत कीजिये साहब! सरकार ऐसे ही काम करती है। जब तक मीडिया ‘मैनेज’ है तब तक पेशानी पर सलवटें लाने वाला कोई भी सवाल सामने नहीं आएगा। लगे रहिए। अफसोस करना या गलती स्वीकारना आपके चरित्र से मेल नहीं खाता।
’रजनीश जे जैन, शुजालपुर, मध्यप्रदेश
यह कुर्बानी
एक समाचार के मुताबिक गोराडीह (अगरपुरा) भागलपुर के मोहम्मद कमरुज्जमा ने ईद पर बकरा खरीदने के लिए रखे साठ हजार रुपए कोसी के बाढ़ पीड़ितों की सेवा में खर्च कर दिए। कुर्बानी का यह वाकई अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया है कमरुज्जमा ने। दुर्भाग्य से उनके इस कार्य की उतनी प्रसंशा नहीं हुई, जितनी होना चाहिए थी। शायद संबधित सामाजिक व धार्मिक नेताओं की प्राथमिकताएं कुछ और रही हों। वैसे त्याग के इस पर्व पर रक्तदान और अंगदान का संकल्प भी किया जा सकता है।
’राधेश्याम ताम्रकार, ठीकरी, इंदौर

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  1. B
    B K GUPTA
    Sep 5, 2017 at 4:14 pm
    चुभता हुआ सच , शानदार, सटीक और तथ्यों से लैस था, रजनीश जैन का ब्लॉग.
    (0)(0)
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