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एक ही दिन दो समुदाय बिना किसी रोक-टोक के अपने-अपने त्योहार क्यों नहीं मना सकते?

कोई भी समाज अपने अल्पसंख्यकों को दबा कर आगे नहीं बढ़ सकता।
Author September 25, 2017 05:44 am
पश्चिम बंगाल सचिवालय में पत्रकारों को संबोधित करती हुई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (PTI Photo)

किसके प्रति ममता

कोई भी समाज अपने अल्पसंख्यकों को दबा कर आगे नहीं बढ़ सकता। वैसे ही कोई समाज अल्पसंख्यक अभिव्यक्ति के लिए बहुसंख्यक तबके की भावनाओं को दबा कर आगे नहीं बढ़ सकता। बात बराबरी की होनी चाहिए। व्यवस्था को इतना बड़ा स्पेस जरूर देना चाहिए जिसमें दोनों को समान अभिव्यक्ति मिले और टकराव न हो। मगर पश्चिम बंगाल में पिछले साल की तरह इस साल भी राज्य सरकार ने मोहर्रम के जुलूस को ध्यान में रखते हुए दुर्गापूजा की प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक लगा दी। कोलकाता हाइकोर्ट ने अल्पसंख्यकों के इस तुष्टिकरण के लिए ममता सरकार को फटकार लगाई और रोक हटा दी। सवाल है कि एक ही दिन दो समुदाय बिना किसी रोक-टोक के अपने-अपने त्योहार क्यों नहीं मना सकते? देश के सभी समुदायों को एक समान नजरिए से देखना होगा, नहीं तो विविधता से भरे इस देश का संतुलन बुरी तरह से गड़बड़ा जाएगा।
’अंकित दूबे, जनेवि, नई दिल्ली

बैंक-शुल्क की मार

भारत में दो तरह के बैंकिंग ग्राहक मौजूद हैं। पहला मध्यम व कम कमाई वाला, तो दूसरा, उच्च आय वर्ग वाला। इसमें बैंकिंग शुल्क के द्वारा मध्यम व कम आय वाले लोगों को चौतरफा मार झेलनी पड़ रही है। जबकि इसका सीधा अनुचित फायदा उच्च आय, उद्योगपति वर्ग तथा बैंकों को हो रहा है। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही जन धन योजना के तहत तीस करोड़ खाते खोल कर लगभग सभी भारतीय परिवारों को देश की बैंकिंग प्रणाली से जोड़ दिया। इसका मौलिक उद््देश्य आर्थिक समायोजन लाना था। लेकिन जो खाता वंचित वर्ग के जीवन में आर्थिक खुशहाली लाता, उसने बैंक-शुल्क के माध्यम से विपरीत प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। वर्तमान समय में बैंक लेन-देन, एटीएम निकासी, खाते में रकम की सीमा निर्धारित कर चुके हैं। इस सीमा के उल्लंघन होने पर बैंक दंड के रूप में बैंक-शुल्क लेते हैं। जबकि जन धन खाते खोलने वालों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो बैंकिंग नियमों के बारे में बिल्कुल नहीं जानते हैं, उनको जागरूक किए बिना उनसे शुल्क लेना कहां तक उचित है?

वित्त मंत्रालय के द्वारा संसद में दिए एक प्रश्न के उत्तर में यह कहा गया था कि देश में जून 2016 तक 49 सरकारी व निजी बैंकों पर छह लाख करोड़ का गैर-निष्पादित धन है, जिसमें 90 फीसद हिस्सा सरकारी बैंकों का है। इसका भी खमियाजा आखिरकार आमजन के द्वारा संग्रहित कर से भुगतान करके होगा, जो अंतत: आम लोगों के ऊपर आर्थिक बोझ के रूप में स्वत: आ जाएगा। इसी के साथ ब्याज दर पर भी भारी भेदभावपूर्ण रवैया बैंकों का रहा है। इसके तहत एक तरफ जहां उद्योग जगत के लोगों को सस्ती ब्याज दर पर कर्ज मिलता है, वहीं आम आदमी को उच्च ब्याज दर पर।
’सुमित कुमार, रीगा, सीतामढ़ी

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