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चौपाल: अपराध और दंड

आखिरी बार 1991 में मराठा-दलित रिश्ते तब बिगड़े थे जब मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बीआर आंबेडकर के नाम पर रखने के लिए आंदोलन चला था।
Author October 12, 2016 04:38 am
पीड़ित लड़की मराठा थी जबकि कथित दोषी दलित समुदाय से थे।

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले काकोपर्डी गांव उस वक्त दहल गया जब वहां एक चौदह वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार कर उसे मौत के घाट उतारने की घटना सामने आई। इस वारदात को दो महीने से अधिक का समय बीत चुका है लेकिन इसने अब जाति का रंग ले लिया है जिस पर सियासी दांवपेच की पूरी तैयारी कर ली गई है। इस लड़की के साथ बलात्कार और हत्या करने वाले तीन युवक दलित समाज के बताए जाते हैं और पीड़िता मराठा समुदाय की थी। इस घटना से जाति का मुद्दा इसलिए जुड़ा कि आरोपियों ने कथित तौर पर पीड़िता के परिवार के खिलाफ अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून 1989 के तहत मुकदमा करने की धमकी दी थी। हालांकि इस बात के सबूत अभी कम हैं।

इस घटना से महाराष्ट्र में दलित और मराठा समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए हैं। आखिरी बार 1991 में मराठा-दलित रिश्ते तब बिगड़े थे जब मराठवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम बीआर आंबेडकर के नाम पर रखने के लिए आंदोलन चला था। यह आग एक बार फिर भड़क गई जब इस साल तेईस सितंबर को राज्य के वर्चस्वशाली मराठा समुदाय ने अहमदनगर में प्रदर्शन किया। अब तक औरंगाबाद, उस्मानाबाद, जलगांव, बीड और परभणी समेत कई जगहों पर इस समुदाय ने प्रदर्शन किए जिनमें तकरीबन तीन लाख लोगों ने हिस्सा लिया। मराठा समुदाय की मांग है कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून का ‘दुरुपयोग’ रोका जाए और नौकरियों व शिक्षा में मराठाओं को आरक्षण मिले। दूसरी तरफ दलित इसे अपने खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी मोर्चाबंदी के रूप में देख रहे हैं।

16 अगस्त 1989 को बनाए गए अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून के तहत छुआछूत, दलित प्रताड़ना और अत्याचार के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान है। ऐसे तमाम मामलों में दोषी पाए जाने पर छह महीने से लेकर पांच साल तक की सजा हो सकती है। बर्बर हत्या के अपराध में तो फांसी तक की सजा मिल सकती है। 2015 में इस कानून में बदलाव कर कुछ नए प्रावधान जोड़े गए और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लोगों को कुछ और अधिकार दिए गए। साथ ही उनका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार करने पर सजा का प्रावधान किया गया।

मराठा और दलित समाज के बीच तनाव की इस आग में राजनीतिक पार्टियां अपनी रोटियां सेंकने में लग गई हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पूनिया मराठा आंदोलनकारियों की दोनों मांगों को न तो जायज ठहरा रहे हैं न वे इस कानून को खत्म करने या इसमें किसी संशोधन की बात कह रहे हैं। उधर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे के मुताबिक अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून को पूरी तरह खत्म करने की जरूरत है।बहरहाल, इस मामले से एक बार फिर नेताओं को राजनीति करने की वजह मिल गई है। लोगों को समझना होगा कि अपराध और अपराधी की कोई जाति, धर्म या समुदाय नहीं होता है। अपराध सिर्फ अपराध होता है चाहे वह गुजरात के उना में किया गया हो या महाराष्ट्र के कोपर्डी में। समय की मांग है कि लोग जाति, धर्म या समुदाय से ऊपर उठ कर सोचें न कि धर्म और जाति के नाम पर आक्रामक होकर अपराध को भी सही ठहराएं।
’विनीता मंडल, आईआईएमसी, नई दिल्ली

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First Published on October 12, 2016 4:38 am

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