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अभिव्यक्ति के जोखिम

बीस अगस्त 2013 को पुणे में नरेंद्र दाभोलकर की दिन-दहाड़े हत्या के बाद गए चार सालों में गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश को मिला कर चार लोगों की एक ही तरीके से और एक ही वजह के लिए हत्या हुई है।
Author September 13, 2017 02:00 am
वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश। Photo Source-Twitter

अभिव्यक्ति के जोखिम
बीस अगस्त 2013 को पुणे में नरेंद्र दाभोलकर की दिन-दहाड़े हत्या के बाद गए चार सालों में गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश को मिला कर चार लोगों की एक ही तरीके से और एक ही वजह के लिए हत्या हुई है। इन चारों की विचार-प्रणाली और काम के तरीके भले अलग-अलग थे, लेकिन उनके बीच समता का एक धागा था और वह यह है कि वे चारों धर्म और संस्कृति की विकृतियों और अफवाहों के कड़े आलोचक थे। इतिहास और वर्तमान को पढ़ने का उनका तरीका अलग था। उन्हें अपने इस आग्रह की कीमत अपनी जान खोकर चुकानी पड़ी।
मतभेदों को विचार, तर्क और अदालती रास्ते से उत्तर देने के बजाय आलोचकों पर गोलियां चलाना फासीवाद है। इन हत्याओं के समय किस राज्य में किस दल की सरकार थी, यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती। अगर केंद्र सरकार कुछ कार्रवाई करना नहीं चाहती हो तो सर्वोच्च न्यायालय की ओर से स्वत: संज्ञान लेकर इन हत्याओं की छानबीन के लिए विशेष जांच दल बनाना वक्त की जरूरत है। यह बात खतरे से खाली नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा कम होता जा रहा है और नई सीमा लहू से खींची जा रही है।
’अनिल रा. तोरणे, तलेगांव, महाराष्ट्र

अकेलेपन की मार
आॅनलाइन खेलों के माध्यम से हो रही आत्महत्या के लिए कहीं न कहीं समाज और परिवार भी जिम्मेदार है। आज जिस तरह शहरी जीवन की व्यस्तता और शहरीकरण ने बच्चों के खेल के मैदानों को निगल लिया है, इसके परिणाम आने शुरू हो गए है। अगर यही हालत बनी रही तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी भयावह होने वाली है, जिसमें आने वाली पीढ़ी गंभीर शारीरिक बीमारियों से ग्रस्त होगी। अब अगर बात की जाए आॅनलाइन खेलों द्वारा आत्महत्या की तो इसके लिए जिम्मेदार परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ रह कर भी साथ न होना है।
हरेक व्यक्ति अपने परिवार के सदस्यों से अनजान और दूर होता चला जा रहा है और जब तक परेशानी का पता चलता है, तब तक काफी देर हो जाती है। इसके समाधान के लिए सरकार को चाहिए कि प्रति एक हजार की आबादी पर बच्चों के लिए पार्क जरूर हों जहां बच्चे खेल सकें। इससे उनका शारीरिक विकास भली प्रकार से होगा। परिवार को चाहिए कि अपने बच्चों से अधिक से अधिक बाचतीत करे, जिससे उनका अकेलापन दूर हो और वे मानसिक रूप से मजबूत बनें।
’शैलेश मौर्य, इलाहाबाद

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