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देश में कितनी सुरक्षा और सहिष्णुता है

हम केवल सपनों और जुमलों में खोये रह कर जीना चाहते हैं।
Author September 25, 2017 05:51 am
पत्रकार गौरी लंकेश की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। (तस्वीर- फेसबुक)

कलम का जोखिम
पिछले दिनों कलम के दो सिपाहियों की हत्या कर दी गई। पत्रकारों पर हमले होते रहते हैं जो चर्चा या चिंता का विषय नहीं बनते, क्योंकि देश को राजनीति और नेताओं से ही फुरसत नहीं मिलती। कर्नाटक में गौरी लंकेश की हत्या तथा हत्या पर जिस तरह आरोप-प्रत्यारोप व कीचड़ उछालने का गंदा खेल खेला गया, वह मानवता को शर्मसार करने वाला है। अब त्रिपुरा में पत्रकार शांतनु भौमिक की हत्या। यह सब हमें बताने के लिए काफी है कि देश में कितनी सुरक्षा और सहिष्णुता है।
चाहे कोई सा भी दौर हो, शासन को सच और सवालों का सामना करना हमेशा नागवार गुजरता है। आमिर खान जब देश में भय और असहिष्णुता की बात करते हैं तो बहुत सारे लोग लामबंद होकर उनके विरोध में खड़े हो जाते है, क्योंकि सच सुनना हमें पसंद नहीं है, हम केवल सपनों और जुमलों में खोये रह कर जीना चाहते हैं।
’अनिल नाथ (अना), नगौर, राजस्थान

शिक्षा की अधोगति
जिस देश में सरकारी फरमान जारी कर शिक्षकों से सामूहिक विवाह समारोह में खाना परोसने का काम कराया जाता है, प्याज की सरकारी खरीदी के बाद प्याज बांटने का काम कराया जाता है, और शौचालय के गड्ढे खुदवाने का काम लिया जाता है, उस देश में शिक्षा का स्तर क्या होगा और वे शिक्षक बच्चों को क्या शिक्षा देंगे, जिनका स्वयं का ही कोई सम्मान नहीं होगा? इसका अनुमान आप स्वयं लगाइए! यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार अपने शिक्षकों के साथ यही ‘सम्मानजनक’ व्यवहार कर रही है!

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा शिक्षकों से यही सब काम कराए जा रहे हैं। अभी एक नया सरकारी आदेश जारी हुआ है, जिसमें शिक्षकों को आदेशित किया गया है कि वे प्रतिदिन शौचालयों के बीस-बीस गड्ढे खुदवाएं और उसी दिन शाम को काम पूरा होने का सबूत फोटो सहित जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को भेजें। शौचालय के गड्ढे खोदने के इस काम में प्राचार्यों, प्रधानाचार्यों और प्रधानाध्यापकों को लगाते हुए प्रशासन जरा भी शर्मिंदा नहीं है। जबकि आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय ने सितंबर 2016 में जिला कलेक्टरों को निर्देश दिए थे कि शिक्षकों की ड्यूटी निर्वाचन कार्यों से इतर अन्य कार्यों में न लगाई जाए। पर जिला प्रशासन द्वारा इन निर्देशों की सरासर अवहेलना की जा रही है। मध्यप्रदेश में काफी पहले से शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य करवाने की बुरी परंपरा बन गई है। शिक्षकों से बच्चों को पोलियो, आयरन और कृमिनाशक दवाई पिलाने, पौधारोपण में ड्यूटी, मध्याह्न भोजन योजना, बैंकों में खाते खुलवाने, आधार कार्ड, समग्र आइडी बनवाने, साइकिल और यूनिफार्म बांटने, आर्थिक-सामाजिक सर्वे तथा जनगणना का काम भी लिया जाता रहा है।

जिस देश में शिक्षकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता है, वहां भावी पीढ़ी कैसी तैयार होगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सिर्फ शिक्षक ही दोषी नहीं है, बल्कि शासन-प्रशासन और समूची शिक्षा प्रणाली दोषी है। जिस देश में अपनी विचारधारा के आधार पर इतिहास को बदलने के कार्य को प्राथमिकता दी जा रही हो, स्कूलों में बच्चों के साथ यौन शोषण की घटनाएं होती हों और उनकी हत्या तक हो जाती हो, वहां शिक्षा विभागों को इस बात की चिंता क्यों होगी कि बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण में विज्ञान-सम्मत उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त हो। यही कारण है कि विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों में हमारा कहीं नाम नहीं है। लेकिन इसकी चिंता किसे है?

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