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युद्ध नहीं बुद्ध

इक्कीसवी सदी में युद्ध अव्यावहारिक हो गए हैं। उनके मुताबिक अब किसी देश की सामर्थ्य उसकी सामरिक क्षमता से नहीं बल्कि आर्थिक मजबूती से आंकी जाती है।
Author August 31, 2017 05:35 am
चीन, भूटान व भारत की सीमा डोकलाम में मिलती है।

युद्ध नहीं बुद्ध
लंबे समय तक डोकलाम पर चीन के साथ चली तनातनी के बीच उसके तमाम भड़काऊ बयानों के बावजूद भारत ने संयम बरत कर एक बार फिर साफ किया कि हमने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध के विचार दिए हैं। इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी युद्ध की पहल नहीं की, हम बुद्ध के शांति संदेशों पर अमल करते रहे हैं। इक्कीसवीं सदी में युद्ध बीते जमाने की बात हो गए हैें।

बीते दिनों संसद में विपक्ष द्वारा चीन के साथ युद्ध की आशंका पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए विदेश मंत्री ने भी स्पष्ट किया कि इक्कीसवी सदी में युद्ध अव्यावहारिक हो गए हैं। उनके मुताबिक अब किसी देश की सामर्थ्य उसकी सामरिक क्षमता से नहीं बल्कि आर्थिक मजबूती से आंकी जाती है। विनाशकारी हथियारों की मौजूदगी में अब युद्ध की प्रासंगिकता नहीं रही। इसमें शक नहीं कि इक्कीसवीं सदी युद्ध की नहीं, बुद्ध के विचारों की होगी।
’दीपक धनगर, शाजापुर, मध्यप्रदेश
हाशिये पर गरीब
खुले बाजार की नीति और भूमंडलीकरण ने सभी देशों पर प्रतिकूल असर डाला है। विश्वभर में आर्थिक विषमता तेजी से अपने पैर फैलाती जा रही है लेकिन हमारे यहां ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नगाड़ा पीटा जा रहा है। यह बहुत दुख की बात है कि गरीबों, वंचितों, शोषितों, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और उनके परिवारों का अस्तिव खतरे में है। बड़े-बड़े उद्योगपति, ठेकेदार और संपन्न वर्ग उनका शोषण कर रहे हैं। ऊपर से विदेशी कंपनियां भी उन्हें चूसने पर आमादा हैं। प्रत्यक्ष रूप से शोषण के अलावा अनेक परोक्ष प्रभाव उनके जीवन पर पड़ रहे हैं। बड़ी-बड़ी बांध परियोजनाओं से लाखों परिवार विस्थापित हो गए हैं और हो रहे हैं। न जाने कितने हरसूद, सिंगरौली, टिहरी और सरदार सरोवर देशभर में बिखरे पड़े हैं। नाम मात्र का मुआवजा देकर लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया गया है। तथाकथित विकास की कीमत चुकाने लिए सबसे ज्यादा मजबूर समाज के निचले पायदान पर रहने को मजबूर गरीब ही होते हैं। गरीबों के हितों के लिए काम करने के बड़बोले दावे करने वाली सरकारों के लिए गरीब महज वोट बन कर रह गए हैं।

प्राकृतिक संसाधनों तक गरीबों की पहुंच समाप्त हो गई है। भूमंडलीकरण का बुलडोजर हमारी अर्थव्यवस्था को रौंद रहा है। पश्चिमी संस्कृति हमारे युवाओं को अपने शिकंजे में जकड़ कर विचारशून्य बना रही है। द्रौपदी के चीर की भांति बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। हमारे रहनुमा और उनके दरबारी अपने मुंह मियां मिट्ठू बन कर घूम रहे हैं और अपनों में ही रेवड़ियां बांट रहे हैं। भूख और कर्ज से मरते देश के अन्नदाताओं की खबर से भी इनके कानों पर जंू तक नहीं रेंग रही है।
’रमेश शर्मा, केशवपुरम, दिल्ली

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