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साहसिक कूटनीति

चीन इन दिनों वैसा ही बर्ताव कर रहा है जैसा 1930-40 के दशक में हिटलर ने किया था।
Author April 11, 2017 05:46 am
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

बौनों के बीच
क्षेत्रीयता के सामने इस देश में सब बौने हो जाते हैं। प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को शिवसेना ने राष्ट्रपति पद के लिए महज इसलिए समर्थन दिया था कि वे महाराष्ट्र से थीं। यहां न जाने क्यों, कोई पूरा हिंदुस्तानी नहीं मिलता; जो भी मिलता है वह कश्मीरी, हिमाचली, पंजाबी, उत्तराखंडी, हरियाणवी, राजस्थानी, बिहारी, बंगाली, असमी, उड़िया, महाराष्ट्रियन, गुजराती, कन्नड़, तेलुगू, तमिल, मलियाली जैसा कुछ होता है! उत्तर प्रदेश का है तो फिर वह किसी जाति विशेष के नाम से पहचाना जाता है!
कनस्तर भले खाली हो पर नेताजी यदि अपने क्षेत्र या जाति के हैं तो हमारे चेहरे की रौनक देखते ही बनती है। इस देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो चर्चित डाकू पर भी, अगर वह अपने क्षेत्र का हो, गर्व महसूस करते हैं!
’सुभाष चंद्र लखेड़ा, द्वारका, दिल्ली
कथनी बनाम करनी
अब जबकि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद सरकारें भी सत्ता संभाल चुकी हैं, प्रधानमंत्री समेत शासक दल को और विभिन्न राज्यों में पक्ष-विपक्षी दलों को यह सोचने की आवश्यकता है कि चुनावी रैलियों और रोड शो के आयोजनों में जो बेतहाशा पैसा खर्च हुआ था वह कहां से आया और क्या उसका कोई हिसाब-किताब है?
एक ओर तो डिजिटल इंडिया की बात की जाती है, पेपरलैस इकोनॉमी का हवाला दिया जाता है मगर दूसरी ओर शक्ति प्रदर्शन के लिए रोड शो किया जाता है! मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री या पूर्व प्रधानमंत्री आते हैं। अनेक राज्यों के मुख्यमंत्री आते हैं। इन पर होने वाला खर्च- सुरक्षा और यात्रा आदि के नाम पर- सरकारी खजाने से जाता है जिसे टैक्स के रूप में आम आदमी भरता है। क्या राज्यपाल के कक्ष में शपथ ग्रहण समारोह नहीं हो सकता? शपथ ग्रहण तो कर्तव्य निर्वहन की शुरुआत है, फिर इतना दिखावा क्यों?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सरकारी आवास में जाने से पहले गृह प्रवेश के लिए शुद्धि करवाते हैं। यह उनका व्यक्तिगत मामला है। तो फिर क्यों इसे टीवी चैनलों पर इतना ज्यादा और इतनी बार दिखाया जाता है? क्या यह देश के वैज्ञानिक सोच के विरोधाभास को नहीं दिखाता है?
कहते हैं कि उत्तर प्रदेश का कोई मुख्यमंत्री यदि नोएडा का भ्रमण करता है तो अपनी कुर्सी खो देता है। पता नहीं वर्तमान मुख्यमंत्री इस टोटके को मानेंगे या नहीं। पर नितांत निजी आचरण, जो वैज्ञानिक सोच के विपरीत बैठता है, वह टीवी पर न ही दिखलाया जाए तो अच्छा है। कम से कम हमारे युवाओं पर तो इसका गलत प्रभाव नहीं पड़ेगा।
’लक्ष्मी नारायण मित्तल, मुरैना
साहसिक कूटनीति
चीन इन दिनों वैसा ही बर्ताव कर रहा है जैसा 1930-40 के दशक में हिटलर ने किया था। उसने अरुणाचल प्रदेश, विशेषकर तवांग पर उसी प्रकार का दावा ठोक रखा है, जैसा चेकोस्लोवाकिया के सुदेतनलैंड पर हिटलर ने ठोका था। यदि एक नया हिटलर पनपने से रोकना है तो भारत और पूर्वी एवं दक्षिण एशिया के देशों को एकजुटता व हिम्मत दिखानी होगी। दलाई लामा के अरुणाचल दौरे पर चीनी आपत्तियों को दरकिनार कर मोदी सरकार ने साहसिक कूटनीति का परिचय दिया है। इससे पहले 1983, 1997, 2003 और 2009 में जब दलाई लामा वहां गए थे तो चीनी धमकियों से डरे भारत ने उन्हें राजकीय अतिथि का सम्मान नहीं दिया था। साथ ही उन पर पाबंदी लगाई थी कि वे चीन या तिब्बत का कोई जिक्र तक वहां नहीं करेंगे। लेकिन इस बार लामा को सम्मानित सरकारी मेहमान मानते हुए केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजीजू उनके साथ गए, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने उनका राजकीय स्वागत किया तथा दलाई लामा ने स्पष्ट शब्दों में तिब्बती स्वायत्तता की अपनी पुरानी मांग उठाई।
यह चीन के मुख पर बेहतरीन कूटनीतिक तमाचा है। वह खिसिया कर तरह-तरह की धमकियां दे रहा है पर भारत बेफिक्र है। हमारे इस बेफिक्र अंदाज ने एशिया के उन तमाम राष्ट्रों को हिम्मत दी की है जो चीनी धमकियों के शिकार बनते रहे हैं।
’अजय मित्तल, मेरठ

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