ताज़ा खबर
 

नोटबंदी के बावजूद

सरकार ने खुद को अलग दिखाने के लिए बिना सोचे-समझे इतना बड़ा निर्णय लिया। उसका परिणाम जनता को भुगतना पड रहा है।
Author September 4, 2017 01:22 am
अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए कहा कि नोटबंदी मोदी सरकार के शासन के अंत की शुरुआत है।

मोदी सरकार के नोटबंदी को लेकर किए गए तमाम दावों (कालाधन जब्त होगा, महंगाई और भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, नकली नोट बंद होंगे, नक्सलवाद व आतंकवाद पर प्रतिबंध लगेगा) की पोल भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रिपोर्ट ने खोल कर रख दी है। उसने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया कि नोटबंदी के बाद 1,000 रुपए के 1.4 प्रतिशत नोटों को छोड़ कर इस मूल्य के बाकी सभी नोट बैंकों में पास वापस आ गए हैं। वर्ष 2016-17 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट में केंद्रीय बैंक ने कहा कि नवंबर में हुई नोटबंदी से पहले 1,000 रुपए के 632.6 करोड़ नोट चलन में थे, जिनमें से केवल 8.9 करोड़ नोट प्रणाली में वापस नहीं आए। इस तरह 8,900 करोड़ रुपए केंद्रीय बैंक के पास वापस नहीं पहुंच

गौरतलब है कि कालेधन पर लगाम लगाने की तथाकथित योजना के तहत केंद्र सरकार ने 8 नवंबर 2016 की मध्यरात्रि को 1,000 और 500 रुपए के पुराने नोटों को बंद करने की घोषणा की थी! पुराने नोटों को बैंकों में जमा करने की अनुमति दी गई थी और असाधारण जमा आयकर विभाग की जांच के दायरे में आ गई थी। सरकार ने 500 रुपए के पुराने नोटों के स्थान पर इस मूल्य के नए नोट शुरू किए गए हैं पर 1,000 रुपए का कोई नया नोट जारी नहीं किया गया है। सरकार ने इस क्रम में 2,000 रुपए का एक नया नोट शुरू किया है। रिपोर्ट में केंद्रीय बैंक ने बताया कि 31 मार्च 2017 तक 500 रुपए के पुराने और नए नोट मिला कर कुल 588.2 करोड़ नोट बाहर थे। 31 मार्च 2016 के अंत में चलन में 500 रुपए के नोटों की संख्या 1,570.7 करोड़ थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2016-17 में नोटों को छापने की लागत दोगुना बढ़ कर 7,965 करोड़ रुपए हो गई जो उससे पिछले वर्ष में 3,421 करोड़ रुपए थी।

इससे तो लगता है कि नोटबंदी सिर्फ अपने पूंजीपति मित्रों के एनपीए भरने के लिए देश की जनता पर थोपा गया निर्णय था, यह आरबीआई की रिपोर्ट से साफ हो गया। जाहिर है, भ्रष्टाचार या पैसे खिलाकर कालेधन को फिर सफेद किया गया, जो मोदी सरकार की ‘नोटबंदी’ पर एक जोरदार तमाचा है जिसकी आवाज वह सुनना नहीं चाहती। रही बात डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने की, वह मकसद भी अपेक्षानुरूप पूरा नहीं हो पाया है। सबसे बड़ा सवाल आज भी यह बना हुआ है कि जैसे पुराने नकली नोट छापे गए, वैसे ही नए नकली नोट छापना कोई बड़ा काम है क्या? एक सवाल और है कि नए नोटों की छपाई में लगा खर्च किससे वसूला जाएगा। बहरहाल, नोटबंदी का रहस्य स्पष्ट हो गया है। जनता की उम्मीदों पर सरकार ने पानी फेर दिया है। रात-दिन भूखे-प्यासे बैंकोंकी कतार में खड़े रहे लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ हुआ है। सरकार ने खुद को अलग दिखाने के लिए बिना सोचे-समझे इतना बड़ा निर्णय लिया। उसका परिणाम जनता को भुगतना पड रहा है।
’देवेंद्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान
निराशा का खाता

प्रधानमंत्री ने जनधन योजना के तीन साल पूरे होने पर देशवासियों को बधाई दी। इस पूरे समय चक्र में जनधन योजना के तहत करीब तीस करोड़ बैंक खाते खोले गए, जिनमें लगभग पैंसठ हजार करोड़ रुपए अभी तक जमा हुए हैं। यह स्वयं में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो इस योजना के सफल होने का प्रमाण भी है। इस योजना के तहत अधिकतर खाते उन ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए जो अब तक बैंकिंग सुविधाओं से वंचित थे, पर इनमें से कुछ लोग अब इस वजह से निराश हैं कि इनके बैंक ने न्यूनतम राशि अपने खाते में न रखने के कारण इन पर दंड स्वरूप कुछ अतिरिक्त राशि आरोपित कर दी है।

नतीजतन, ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतर बैंक खाते आज निष्क्रिय हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक स्थिति ऐसे नियमों के अनुकूल नहीं है। हम ‘लेशकैश’ से ‘कैशलेश’ की ओर अग्रसर हैं पर किसी प्रकार के ‘आॅनलाइन ट्रांजेक्शन’ करने पर लगने वाला अतिरिक्त शुल्क ऐसे गरीबों को हतोत्साहित कर रहा है। आज भी हमारे देश की करीब आधी आबादी बहुत संपन्न नहीं है और किसी योजना के सफल होने के लिए उसका योगदान भी आवश्यक है। जनधन योजना की सफलता तभी मानी जाएगी जब इससे जुड़े अन्य लक्ष्य जैसे ‘कैशलेश इकॉनमी’ व ‘आॅनलाइन ट्रांजेक्शन’ भी पूरे होते नजर आएं।
’शुभेंद्र सिंह, लक्ष्मी नगर, नई दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग