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हिंदी दिवस के मौके पर हिंदी का खूब हो-हल्ला मचता है

Hindi Diwas 2017: हिंदी दिवस पर हम हिंदी की दुर्दशा पर आंसू बहाते हैं और शेष 364 दिन अपने बच्चों के लिए सबसे आधुनिक कॉन्वेंट कल्चर वाले अंग्रेजी स्कूल की तलाश करते हैं!
Author September 14, 2017 10:52 am
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर।

हिंदी की बिंदी

हर साल हिंदी दिवस के मौके पर हिंदी का खूब हो-हल्ला मचता है और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। जैसे हिंदी दिवस न हो, हिंदी की श्राद्ध तिथि हो! हिंदी दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। इसका भारतीयों से रक्त संबंध का नाता है। आज हिंदी को राजभाषा से ज्यादा संपर्क भाषा बनाने की आवश्यकता है। आखिर क्या वजह है कि इतने व्यापक प्रचार-प्रसार और इतने सालों से हिंदी दिवस मनने के बावजूद क्यों न्यायालय के फैसले हिंदी में नहीं लिखे जाते? विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र की किताबें क्यों हिंदी में नहीं छपतीं? तकनीकी, प्रबंधन और कंप्यूटर में दक्षता हासिल करने के लिए क्यों अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हिंदी दिवस के दिन हर हिंदी प्रेमी के मन में उठने स्वाभाविक हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी को संपर्क भाषा बना कर उसमें कामकाज को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन देखा यह जा रहा है कि हिंदी सिर्फ अनुवाद की भाषा बन कर रह गई है। हिंदी का सवाल केवल भाषा का सवाल नहीं है। यह संस्कार और संस्कृति से जुड़ा विषय भी है। बच्चों में टीवी, इंटरनेट और विडियो गेम के बढ़ते खतरों के लिए कहीं न कहीं हमारे भाषा संस्कार भी जिम्मेदार हैं। आज बच्चों की जिंदगी से मां की लोरी के गीत और दादी-नानी की कहानी का संगीत लुप्त हो गया है। इस कारण उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब हो गया है। तभी तो ‘ब्लू व्हेल’ के वायरस उनकी जिंदगी में प्रवेश कर उसे दीमक की तरह चाट-चाट कर तबाह कर रहे हैं। अजीब विरोधाभास है कि हिंदी दिवस पर हम हिंदी की दुर्दशा पर आंसू बहाते हैं और शेष 364 दिन अपने बच्चों के लिए सबसे आधुनिक कॉन्वेंट कल्चर वाले अंग्रेजी स्कूल की तलाश करते हैं!

यह दोहरी मानसिकता ही हिंदी की प्रगति के मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध है। ‘हिंदी की डिग्री वाले सड़कों पर घूम रहे हैं, अंग्रेजी वाले सत्ता के गलियारों में घूम रहे हैं’। हमें इस मानसिकता को गलत ठहराना होगा। आने वाली पीढ़ी को यह विश्वास दिलाना होगा कि भाषा तो सिर्फ एक जरिया मात्र है। असली ताकत ज्ञान है जिसे किसी भी भाषा में हासिल कर मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। जिस दिन सबके मन में यह विश्वास बैठ जाएगा कि हिंदी से भी ऊंची नौकरी, ऊंचा ज्ञान, उच्च तकनीक और वैज्ञानिक ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है उस दिन हिंदी की बिंदी स्वयंमेव चमक उठेगी। तब बिना हिंदी दिवस मनाए ही लोग अपने बच्चों को हिंदी भाषा में पठन-पाठन और व्यवहार की ओर प्रेरित करने लगेंगे।
’देवेंद्र जोशी, उज्जैन

कैसे बाबा
देर से ही सही लेकिन फर्जी बाबाओं की सूची जारी करके अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने एक अच्छा काम किया है। अब देखना है कि केंद्र और राज्य सरकारें इसे कितनी गंभीरता से लेती हैं। भोले भाले लोगों को ईश्वर दर्शन और आत्मा-परमात्मा की मरीचिका में उलझा कर उनका शारीरिक-आर्थिक शोषण करने वाले बाबाओं को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो समाज में एक मिसाल बने। इन्होंने समाज कीन जाने कितनी प्रतिभाओं को कुंद किया होगा, न जाने कितने मासूम सपनों को नृशंसता से कुचला होगा, न जाने देश और समाज के काम आ सकने वाले कितने महत्त्वपूर्ण लोगों की हंसती-खेलती जिंदगियों को बर्बाद किया होगा। आश्रम में रख कर बच्चों को साधू या साध्वी बनाने का यह प्रपंच अब समाप्त होना चाहिए क्योंकि यह उनके बचपन से अन्याय है।
’सुशील कुमार शर्मा, द्वारका, नई दिल्ली

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