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रक्षक बनाम भक्षक

अगर जनाक्रोश नहीं भड़कता तो मासूम गुड़िया के बलात्कार और हत्या का सच पुलिस की फाइलों में दबा रह जाता।
Author September 5, 2017 04:45 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

रक्षक बनाम भक्षक
जिसे कानून का रक्षक होना चाहिए अगर वही भक्षक बन कर आम लोगों की आंख में धूल झोंकने लगे तो इस देश का भगवान ही मालिक है। हिमाचल प्रदेश के कोटावाई गांव में नाबालिग लड़की गुड़िया के साथ बलात्कार और बाद में उसकी हत्या की घटना का सच जनता के सामने आ ही नहीं पाता अगर व्यापक जनाक्रोश के बाद सीबीआइ विशेष कार्यबल (एसआइटी) गठित नहीं करती। आश्चर्य और अफसोस की बात है कि पुलिस की भूमिका शुरू से इस मामले को दबाने और लीपापोती करने वाली रही है क्योंकि अब तक की जांच से जो तथ्य सामने आए हैं उनके अनुसार इसमें पुलिस की संलिप्तता नजर आ रही है। हद तो तब हो जाती है जब बढ़ते जन दबाव और सीबीआइ हस्तक्षेप के बाद हिरासत में लिए गए छह आरोपियों में से एक की पुलिस हिरासत में हत्या हो जाती है।
यहीं से सीबीआइ के शक की सुई पुलिस की भूमिका की तरफ घूमने लगती है। इसकी परिणति के रूप में गुड़िया के साथ बलात्कार, उसकी हत्या और आरोपी सूरज के कत्ल की साजिश के आरोप में वहां के आइजी एस जहूर जैदी और डीएसपी मनोज जोशी सहित आठ पुलिसवालों को हिरासत में लिया जाता है। सच का पता लगाने के लिए अब गिरफ्तार पुलिस अधिकारियों का ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ और ‘ब्रेन मैपिंग’ कराने की बात कही जा रही हो। लेकिन मूल प्रश्न अपनी जगह कायम है कि जिस पुलिस का काम लोगों की हिफाजत करना है वह अपने कर्तव्य को धता बता कर इतनी नीचे कैसे गिर सकती है कि एक नाबालिग के साथ बलात्कार को अंजाम देने के बाद जांच को गुमराह करने के लिए आधा दर्जन फर्जी लोगों को गिरफ्तार करे और सच कभी सामने ही न आ सके इस नीयत से तथाकथित मुख्य आरोपी की हिरासत में हत्या को अंजाम देकर मामले को रहा-दफा करने का षड्यन्त्र रच दे! सब कुछ किसी फिल्मी कहानी की तरह लगता है। लेकिन यह महज कहानी नहीं, आज के समाज का जीता-जागता सच है। अगर जनाक्रोश नहीं भड़कता तो मासूम गुड़िया के बलात्कार और हत्या का सच पुलिस की फाइलों में दबा रह जाता।
’देवेंद्र जोशी, महेश नगर, उज्जैन
अन्य विकल्प
जिस कसौटी पर खरे न उतरने के कारण केंद्रीय मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों को हटाया गया है, क्या उस कसौटी पर नए मंत्रियों को भी थोड़ा परख लिया गया है कि वे भविष्य में अयोग्य तो साबित नहीं होंगे? नौकरशाहों को कैबिनेट में अधिक तरजीह देकर मोदीजी ने विरासती राजनीतिकों को संदेश दिया है कि 2019 के पूर्व अच्छे दिन लाने में वे ही एकमात्र उम्मीद नहीं हैं। अन्य विकल्पों को प्राथमिकता देकर वे जनता-जनार्दन से किए गए वायदे पूरे करने के लिए कृतसंकल्पित हैं।
’आरती सिन्हा, पटना

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