June 26, 2017

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दावों की कलई, गंगा मैली

गंगा-यमुना का प्रदूषण कोई नई बात नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में नदियों की सफाई का मुद्दा उठाया था।

Author April 13, 2017 05:46 am
गंगा (फाइल फोटो)

दावों की कलई

बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन जिन बच्चों का वर्तमान ही अंधकार में है, वे आगे जाकर देश का भविष्य कैसे बनेंगे? जिन हाथों में कलम होनी चाहिए, वे कचरा बीन रहे हैं। आज दुनिया में सर्वाधिक बाल मजदूर भारत में हैं। आजादी के 70 साल बाद भी बाल मजदूरी का कलंक हम नहीं मिटा पाए हैं। पूरे देश में 6 से 14 वर्ष आयु के सभी बच्चों को कक्षा आठ तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दिलाने वाला शिक्षा का अधिकार कानून अप्रैल 2010 से लागू है लेकिन लाखों बच्चे आज भी स्कूलों से दूर हैं। इसका मतलब है कि राज्य सरकारों ने इस कानून को लागू करने में आवश्यक राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं दिखाई है। भारत में बाल मजदूरी का सबसे बड़ा कारण गरीबी है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि गरीबी, निरक्षरता और बाल मजदूरी को एक साथ निशाना बनाया जाए। भारत में खतरनाक और जोखिम भरे उद्योगों में बच्चों को काम कराना पूरी तरह प्रतिबंधित है, पर आज भी वे खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं। इससे बच्चों में फेफड़े की बीमारियां, तपेदिक, अस्थमा व ब्रौंकाइटिस जैसे रोग हो जाते हैं। असंगठित क्षेत्रों में बच्चों के संरक्षण का अभाव है। घरेलू नौकर, फेरी लगाने वाले, कचरा बीनने वाले और ताला बनाने वाले उद्योगों में बच्चों का शोषण भी बहुत अधिक होता है।
सरकारी स्कूलों की जर्जर दशा के कारण आज भी लाखों बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं। स्वच्छ पेयजल व शौचालय के अभाव में बच्चे स्कूल जाना पसंद नहीं करते। ग्रामीण इलाकों में छात्रों व शिक्षकों का अनुपात तो और दयनीय तस्वीर बयां करता है। हजारों स्कूलों में आज भी पचास छात्रों पर एक शिक्षक है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में शिक्षा का अधिकार कानून को पूरी तरह लागू करने के लिए दस लाख नए शिक्षकों की जरूरत होगी। बच्चों व शिक्षकों के अनुपात को बेहतर किए बगैर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की बात करना बेमानी है। बच्चों के बढ़ते नामांकन पर भले ही सरकार गौरवान्वित महसूस करती हो, पर नामांकन के बावजूद छात्रों की कक्षा में निरंतर अनुपस्थिति और स्कूल छोड़ने की ऊंची दर सरकारी दावों की कलई खोलने के लिए काफी है।
’कैलाश मांजु बिश्नोई, मुखर्जी नगर, दिल्ली
गंगा मैली
गंगा-यमुना का प्रदूषण कोई नई बात नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में नदियों की सफाई का मुद्दा उठाया था। तभी उस पर बहस भी शुरू हुई लेकिन वह सब गंगा की सफाई तक सीमित रह गया है। आज बढ़ती जनसंख्या व आर्थिक विकास के कारण देश में और भी कई पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो रही हैं। शहरीकरण और उद्योगों के लिए जंगलों को नष्ट किया जा रहा है। भारत में आदिकाल से ही नदियों के महत्त्व को समझ लिया गया था और उन्हें धर्म से जोड़ा गया, ताकि नदियों को कोई प्रदूषित न करे।
नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि सत्ता में आए तो स्वच्छ गंगा संरक्षण मिशन परियोजना शुरू करेंगे। लेकिन आज भी गंगा के किनारे कारखाने, फैक्टरियां इंतजार में हैं कि कब गंगा ऊपर से साफ हो और हम कब उसमें नीचे से कचरा डालना शुरू करें। मानव भी अपना मैल गंगा में धोने के लिए उतावले हैं। नेता लोग गंगा के बाबत बड़ी-बड़ी बातें कह कर चले जाते हैं लेकिन करते कुछ भी नहीं।
’जयदीप कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय

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First Published on April 13, 2017 5:44 am

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