ताज़ा खबर
 

चौपाल: सोच की सफाई

गांधी की स्मृति बनाई जा रही थी, पर कुछ इस अंदाज में कि न सफाई की समझ बन रही थी, न ही गांधी की।
Author October 14, 2016 04:30 am
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी।

दो अक्तूबर को सुबह जुहू बीच से लेकर जामा मस्जिद तक टेलीविजन ने स्वच्छ भारत और गांधी के डिस्को अवतार को दिखाना शुरू कर दिया था। गर्व करने की बात भी थी! गौर से देखने पर मन में अजीब-से प्रश्न आ रहे थे। एक सौ मीटर के दायरे में लगभग पचास युवक-युवतियां रेत पर झाड़ू फेरे जा रहे थे। गांधी की स्मृति बनाई जा रही थी, पर कुछ इस अंदाज में कि न सफाई की समझ बन रही थी, न ही गांधी की। यदि नमक बनाते नजर आते तो कहना ही क्या था! पर इसे विरोधाभास मत समझिएगा। दरअसल, जब-जब सत्ता किसी व्यक्ति की सामूहिक जनमानस की याद की जगह अपनी ‘मैन्युफैक्चर्ड’ याद थोपने में जुट जाती है, तो ऐसे ही वक्र कारनामे होते हैं। अमिताभ बच्चन से लेकर तमाम बड़ी हस्तियां स्वच्छता के इस ग्लैमरस अवतार का हिस्सा बन कर सामाजिक संदेश भेजते रहे हैं। अगले वर्ष भी भेजेंगे ही। सिलसिला थमने वाला नहीं है। ट्वीट्स का जो जमाना है!

पर स्वच्छता का सवाल क्या केवल गंदगी जैसे की कूड़ा-करकट, प्लास्टिक, डिस्पोजेबल कप-प्लेट, गुटके के पीक, पन्नियां और रैपर तक सीमित है? सरकार की पहल में बहुत बड़ी उपलब्धि है स्वच्छता के साथ शौचालय और उसके साथ हमारी माता-बहनों का कोण जोड़ देना। खूब वाहवाही भी लूटी जाएगी। हालांकि ग्रामीण क्षेत्र में जाएं तो आपको शौचालय मिल जाएंगे पर मल-मूत्र करने की सीट और सीवर नहीं मिलेगा। मगर स्वच्छता का प्रश्न अलग दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। आपको कहीं और जाने की जरूरत नहीं। गांधी से ही सीख लेना बहुत होगा।

गांधी ने जब अपने आश्रम में सबको कहा था कि आप अपना मल स्वयं साफ करेंगे तो उनका विमर्श केवल उस मल से आती बदबू या गंदगी तक सीमित नहीं था। बल्कि इसके जरिए वे जाति व्यवस्था के अभिन्न अंग को चोट पहुचना चाहते थे, साथ ही श्रम की नई परिभाषा भी रच रहे थे। जाति व्यवस्था में मल-मूत्र आदि को अशुद्ध माना गया है, और यहीं से आपको सर पर मैला ढोने की सामाजिक सोच की नींव दिखेगी जिसके केंद्र में है यह ब्राह्मणवादी विचार कि ‘नीचे’ समझे जाने वाले काम ‘अछूत’ समुदाय करेगा। दरअसल गांधी अपने स्वच्छता प्रयोग के जरिए न केवल इस सोच पर प्रहार कर रहे थे, बल्कि आधुनिकतावाद के प्रबल आलोचकों में से एक होने के कारण, मनुष्य को प्रकृति के समीप भी ले जाना चाह रहे थे। अभी भी यह समस्या हमारे सामने विकराल रूप में मौजूद है। पर गांधी का ‘ग्लैमरीकरण’ न केवल उनके इस क्रांतिकारी विचार की तौहीन है, बल्कि घटिया मजाक भी है।

स्वच्छता को पुन: गांधी के करीब ले जाने की जरूरत है। उना में जो घटना हुई, और रोहित वेमुला से जिस तरह का जाति-आधारित भेदभाव हमारे आधुनिक संस्थानों में किया गया, इनसे जुड़ा है स्वच्छता और अस्वच्छता का प्रश्न। हमारे मस्तिष्क में बैठी गंदगी आपको वैवाहिक विज्ञापनों, सांवले रंग वाले लोगों से बर्ताव और भिन्न अल्पसंख्यकों से होते बर्ताव में नजर आएगी। इसके लिए डिस्को बीट्स और ग्लैमरस गांधी काम नहीं आएंगे। झाड़ू की गति और दिशा बदलने की जरूरत है।
’आदित्य, दिल्ली

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग